नवसृजन का आरंभकाल
नहीं उगता है विष - बेल एक दिन में
न सूखता है स्नेह - स्रोत एक दिन में
मूल्यों का क्षरण एक दिन में नहीं होता
नफरत का सैलाब एक दिन में नहीं आता
धीरे - धीरे होता है रूपांतरण
त्याग का तृष्णा में
परमार्थ का स्वार्थ में
समग्रता का निजता में
अग्रगति का अधोगति में
मानवता का पशुता में
धीरे - धीरे सूखता है आँख का पानी
धीरे - धीरे मरती हैं हमारी संवेदनाएँ
रिश्ते जब खोने लगते हैं अपना अर्थ
होता है चारो ओर अनर्थ ही अनर्थ
पर , ऐसे अँधेरे समय में भी
विवेकशून्य नहीं हो जाता समाज
कुछ लोग निकलते हैं अँधेरे के खिलाफ
हाथ में परिवर्तन का मशाल लिये
होता है तब
सोच का वैज्ञानिकीकरण
भीषण अँधेरे को चीरता
चमकता है ज्ञान का प्रकाश पूंज
नवसृजन का आरंभकाल !
--- कुमार सत्येन्द्र
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