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अलविदा

अलविदा !

और एकदिन
अचानक तुम चले गए
मेरे सामने तुम्हारा पार्थिव शरीर था
स्पंदनहीन ...बर्फ से भी ठंडा
यह अनुबंध तो नहीं था हमारे बीच
संबंधों की गाँठ कैस ढीली पड़ी
कि तुम अकेले निकल पड़े 
एक अनजाने सफर पर !

तुम्हारा जाना 
मानो मेरी साँसों की लड़ियों का टूटना है
घर का अचानक ही भहराकर गिर जाना है
सूरज का किसी अज्ञात अँधेरे गुफा में छिप जाना है
शाखों पर खिले -अधखिले फूलों का मुर्झाना है
दुनिया का रंगविहीन होना है
 वाद्ययंत्रों का संगीत विहीन होना है
तुम्हारा जाना 

आधी रात को
अँधेरे में डुबे घर - आँगन में बैठा
निहारता हूँ  तारों से भरे आकाश को
ढूँढता हूँ तुम्हें
इस विश्वास के साथ कि 
इन्हीं तारों में कहीं तेरा भी वजूद हो अब

आत्मा पर एक बोझ लिए जिंदा रहूँगा
हा ! कुछ भी तो नहीं कर पाया मैं
एक अदद सिलिंडर की जुगाड़ भी नहीं
ऑक्सीजन के एक एक कतरे के लिए 
तरसते रहे तुम
मैं असहाय सा देखता रहा 
तुम्हारा तिल-तिल कर मरना ... !

उनके लिए तेरा जाना
डेढ़ अरब से एक इकाई की अनुपस्थिति है
मेरे लिए तेरा जाना
पूरी कायनात का शून्य में विलीन होना है

जानता हूँ 
यह पहाड़ सा भारी समय भी कट जाएगा
दीवार पर टंगी घड़ी की सुइयाँ 
टिक-टिक-टिक चलती रहेंगी
थम जाएगा यह तूफान भी
सब कुछ सामान्य हो जाएगा
पर , मुझ जैसे असंख्य अभागों के जीवन में
यह वक्त एक ताजा जख्म सा टिसता रहेगा 
अलविदा मेरे हमसफर दोस्त !
अलविदा ....अलविदा !

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