मगही कविता
अभियो त ओकरा पहचान
तू कइसन चुनले परधान
घर-घर में जमुआ ढूकल हे
तान के लंबा ऊ सुतल हे
श्मशान में लैन लगल हे
एने-ओने ल्हास बिगल हे
लोर में डूबल हिंदुस्तान
कइसन तू चुनले परधान
बीच अधर में जान हे अँटकल
ससुर कोरोना सबके पटकल
अफरा-तफरी , रोहा - रोहट
देख के मंतरी सब हे सटकल
नाम डुबयलक सकल जहान
कइसन तू चुनले परधान
हस्पताल में बेड न खाली
भेन्टीलेटर मिललउ जाली
बिन आक्सीजन ऊ हो मरलन
हलन बजवले ताली - थाली
सबके साँसत में हउ जान
कइसन तू चुनले परधान
ऐक्सीन - भैक्सीन कुछ न देतऊ
सबके गोबरा में नेहवतऊ
फिर बछिया के मूत पिया के
अप्पन बड़का महल बनतऊ
नाम के खातिर लेतउ जान
कइसन तू चुनले परधान
---- कुमार सत्येन्द्र
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