यकीन नहीं होता
जब आस्थाओं के जंगल में
खो जाते हैं तर्क , विवेक
अफवाहों की आँधी में
तिनकों की मानिंद उड़ता है सत्य
तब कानों सुनी बातों पर कौन कहे
आँखों देखी बातों पर भी
यकीन नहीं होता
जब खिली - अधखिली कलियाँ
अचानक ही मुर्झाने लगें
रंग-बिरंगे पंखों वाली शोख तितलियाँ
कहीं न दीखें
पतझड़ तो पतझड़ बसंत में भी
बाग उजड़ने की खबर आए
तो , सच कहता हूँ दोस्त !
यकीन नहीं होता ....।
----- कुमार सत्येन्द्र
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