मैं और मनुआ अपने शहीद साथी कॉ.वाई. प्रसाद की शहादत दिवस पर आयोजित संकल्प सभा से लौटकर ठेका मजदूरों की मांगों पर चर्चा कर ही रहे थे कि पांडे लंबे लंबे डग भरता हुआ आ धमका । " का मनुआ , मैं जो कहता था वह सही निकला न ? "" कौन सी बात पांडे भइया ? "" यही कि ऊ लोग कसाई होते हैं , कसाई ... पूरा का पूरा जल्लाद । देखा ससुरे ने बेचारी सरधा के शरीर के 35 टुकड़े कर दिए... बहुत प्यार करती थी वह उससे ... अपने मां - बाप को भी त्याग दिया था ... उस राच्छस के लिए...।" " अच्छा, तो आप उस आफताब पूनावाला की बात कर रहे हैं ", मनुआ ने मुस्कुराते हुए कहा , " पर , पांडे भइया ! वह वो नहीं है जो आप समझ रहे हैं । वह तो शायद पारसी है....। "" अरे , आरसी...पारसी कुछ भी हो , सब एके हैं ...।"" ई आपने ठीक कहा भइया ! अपराधियों की न कोई जाति होती है और न ही धरम । एक ने तो ....का नाम था उसका ... हां... राजेश गुलाटी , उसने तो अपनी पत्नी के शरीर के 72 टुकड़े करके फ्रीजर में रखे दिये थे । "" पता नहीं , तुम किसकी बात कर रहे हो ! ....अरे बुड़बक ! यही वह शैतान है जिसने लड़की के 35 टुकड़े करके फ्रीजर में रखा था और रोज एक टुकड़ा.....। "" जंगल में फेंकता था , यही न । इसने शायद राजेश गुलाटी का ही नकल किया है , पांडे भइया! इसमें धर्म वाली कौनो बात नहीं है । हमलोगों ने समाज में नफ़रत का इतना जहर घोल दिया है कि आदमी वहशी हो गया है , दरिन्दा हो गया है ....। अब देखिए न , उधर म.प्रदेश में तो एक लड़के ने तांत्रिक के चक्कर में पड़ कर अपनी मां की ही बलि दे दी । इतना ही नहीं , उसने बड़े प्रेम से उसका खून पीया , उसका मांस खाया ....।"" अब लगे तुम एने ओने की बात करने । अरे भकचोन्हर ! तुम इन लव जेहादियों को नहीं जानते हो......। "" अच्छा ...! तो इस घटना से आप मर्माहत न होकर खुश हो रहे हैं , कि आपको लाश पर राजनीति करने का एक और मौका मिल गया , है न ? "" लो , इस अफतबवा की भर्त्सना करने की बजाय तुम मुझ पर ही राजनीति करने का आरोप लगाने लगे । पता नहीं , तुमलोगों को अपनी कौम की चिंता क्यों नहीं होती ! "" होती है पांडे भइया ! पर , उससे ज्यादा अपने देश की चिंता होती है । देश में अमन और भाईचारे की चिंता होती है .....। "" अब तुम लगे राजनीति बतियाने । कुछ देर में हमारे प्रधानमंत्री जी की मलामत शुरू कर दोगे । वे देश को विश्वगुरु बनाने में आकाश पाताल एक किये हुए हैं और तुम लोग हो कि उन्हीं की टांग खींचने में सारी शक्ति झोंक रहे हो .....। "" क्या भइया, अभी भी नहीं दिख रहा है कि देश रसातल की ओर जा रहा है ! शिक्षा , स्वास्थ्य , रोजी - रोजगार सब का बुरा हाल है । महंगाई सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती ही जा रही है । आखिर आप कब तक शुतुरमुर्ग बने रहिएगा...? "" दूर बुड़बक , सगर रतिया , एके बतिया ! तुमलोग नहीं सुधरोगे....। ", कहते हुए पांडे ने मैदान छोड़ दिया । हम अपनी बातचीत के टूटे सिरों को ढूंढने लगे ।
मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र! सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं। इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...
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