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जवाब तुम्हारे खत का

प्रिये! 
पाया तुम्हारा खत
बिन खोले ही 
पढ़ लिया मैने
खत के सारे मजमून
तुमने लिखा है 
शीघ्र ही देना जवाब
पर, मेरे हाथ 
थक चुके हैं
दुहराते हुए एक ही वाक्य
मेरा पिछला खत 
या कि पिछले का पिछला खत ही
है तुम्हारे इस खत का जवाब

प्रिये  ! 
जानता हूँ मैं
जब हवा में उड़कर
तमाम नदी - नालों को लांघकर
पहुंचता है मेरा खत गाँव में
डाकिए का पदचाप 
रोक देता है 
गोबर पाथते 
माँ के हाथों को
बैलों की पूंछ उमेठते
खेतों की ओर जाते
पिता के पांवों को
और बरबस ही तुम भी
खिंची चली आती हो 
उस नीले पत्र की ओर
लजाती - सकुचाती 
पकड़े साड़ी का छोर
तैर जाते हैं सबके चेहरे पर
खुशी के भाव
थम जाती है हवा
बंद कर देती है चिड़िया
अपना कलरव गान

किंतु, खत का मजमून
सोख्ता बनकर 
सोख लेता है
सबके चेहरे पर उभरे भावों को
और तब 
वह मामूली खत 
चिंदी - चिंदी होकर 
चढ़ जाता है भेंट
दरवाजे के बाहर पड़े
घूरे के ढेर को। 

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