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धिक्कार

नत नयन थी
भय या फिर लाज से 
मांग में सिंदूरी सूरज था चमकता
गोद में ले शव पति का
चढ़ गई थी वह चिता पर
घूरती उन कायरों को
जो खड़े थे मूंछ ऐंठे
हाथ में तलवार लेकर

पूछती थीं उसकी आँखे
क्या नहीं उनको जनी थी एक औरत
क्या नहीं है धर्म उनका 
लाज रखना उस बहन का
जिसकी दुनिया ही अंधेरी हो गई है  ? 

धिक् - धिक् धिक्कारती 
एक और रानी
चढ़ गई जलती चिता पर
रह गई बस गूंजकर 
एक चीख सी वातावरण में

दूर तक कोई न रोया
हाय! जिंदा जल गई 
भारत की बेटी
और बेटों ने मनाया जश्न
दुंदुभि बजाकर
पर, तमाचा जड़ गई वह
उनके मुँह पर
जो प्रगति का ढोंग 
रचते हैं यहाँ पर

वह विवश थी 
या कि वह राजी खुशी थी
इन सवालों को लिए
सिर धुन रहा सारा जमाना
जो न माना नारियों को
आज तक खुद के बराबर
कर सकेगा न्याय क्या वह
कातिलों को एकदिन
सूली चढ़ाकर  ? 

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