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यात्रा वृतांत

इस यात्रा का दूसरा पड़ाव -- उत्तराखण्ड की राजधानी, देहरादून। यहाँ हम अपने प्रिय मित्र दिनेश चंद्र घिल्डियाल के अतिथि बने। दिनेश और मैं भारतीय नौ सेना की सेवा में एक साथ थे और तकरीबन ढाई वर्षों तक एक ही जहाज में पदस्थापित थे। 1978 के बाद हम ऐसा बिछड़े कि एक - दूसरे से संपर्क ही टूट गया। तब पत्राचार ही संपर्क का एकमात्र माध्यम होता था और तबादले के कारण हमारे ठिकाने लगातार बदलते रहते थे। फिर 1983 में मैंने अचानक ही नौसेना से स्वेच्छा पूर्वक सेवानिवृत्ति ले ली और नौसेना के साथ ही मुंबई को भी अलविदा कह दी।
            जिंदगी में आए इस नए मोड़ ने मुझे नौसेना के कई मित्रों से बहुत -  बहुत दूर कर दिया। हम चाहकर भी एक दूसरे की खोज - खबर नही ले पाए। मोबाईल फोन, इंटरनेट, फेसबुक , ह्वाट्सएप और ट्वीटर आदि ने दुनिया में जो क्रांति लाई, उसका पूरा लाभ मुझे मिला और 2017 में लगभग 40 - 41 वर्षों के अंतराल के बाद नौसेना के मेरे बैच के एक साथी दर्शन सिंह से मेरा संपर्क हुआ। उसने कई साथियों के फोन नंबर शेयर किये। उसमें एक दिनेश का भी था। मैंने तत्काल उन सबसे संपर्क साधा और आज हम वर्षों बाद एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। उम्र के जिस पड़ाव पर हम पहुँच चुके हैं, जाहिर है कि सभी लोग उम्रजनित रोगों से ग्रस्त हैं या शारीरिक रूप से कमजोर हो गए हैं। दिनेश के बारे में जानकर उससे मिलने की इच्छा प्रबल हो गई। खेल - कूद तथा नृत्य - संगीत में विशेष रुचि रखने वाला, मस्तमौला दोस्त दिनेश की दोनों किडनियां खराब हो चुकी हैं । जब उससे विडियो कॉल कर मैंने बात की तो उसे पहले जैसा ही हंसमुख और बेफिक्र पाया। हफ्ते में तीन दिन डायलिसिस पर रहने वाला व्यक्ति इस तरह उन्मुक्त होकर बातें कर सकता है, मैंने कल्पना भी न की थी। उसकी जीवटता और जीजिविषा से मुझे नई प्रेरणा मिली। जब भी हमारी बात होती, वह मुझे अपने घर आने के लिए आग्रह करता। अपने पारिवारिक व सामाजिक जिम्मेदारियों के कारण मेरे लिए वहाँ जाना संभव नहीं हो पा रहा था। किन्तु, इसबार मैंने दिल्ली के साथ ही देहरादून, हरिद्वार और अंबाला जाने की योजना बना डाली। हलांकि अंबाला जाना  इस बार भी संभव नहीं हो पाया।
दिनेश और उसके परिवार से मिलकर बेहद प्रसन्नता हुई। उनकी मेहमाननवाजी तो मैं ताऊम्र नहीं भूल पाऊंगा। दिनेश की जिंदादिली ने मुझे यह सिखलाया कि विपरीत परिस्थितियों में भी बेफिक्री के साथ कैसे जिया जाता है। पिछले चालीस वर्षों के अनुभवों को साझा करने के लिए डेढ़ दो दिन बेहद नाकाफी थे। अत: निकट भविष्य में पुनः आने का वादा कर मैंने अपने प्रिय मित्र से विदा ली, यह शुभकामना व्यक्त करते हुए कि वह सदैव प्रसन्न रहे। 

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