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माँ, पटना और मैं

साल 1967 । देश में आमचुनाव के लिए धुआंधार चुनाव प्रचार चल रहा था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी जहानाबाद आने वाली थी । तब जहानाबाद एक छोटा कस्बा था। गया - पटना रेल खंड पर एक साधारण सा रेलवे स्टेशन। उन दिनों मेरी माँ किसी  कारणवश  तकरीबन एक महीने से पटना में रह रही थी। गांव में माँ की अनुपस्थिति मुझे बेहद खल रही थी। उस वक्त मेरी उम्र कोई 11 वर्ष रही होगी। मेरा मन न पढ़ने में लग रहा था और न ही खेलने में। मैं हर समय उदास रहता और बात बात पर अपनी बहनों पर झल्ला पड़ता। तब मेरी दोनों बड़ी बहनों और मैने मिलकर एक योजना बनाई । वगैर पिता जी की अनुमति के यह तय हुआ कि मैं माँ से मिलने पटना चला जाऊँ। इंदिरा गाँधी के आने की चर्चा हमारे उस छोटे से गांव में भी जोरों पर थी। मेरे कई वरिष्ठ सहपाठी उन्हें देखने - सुनने जहानाबाद जाने वाले थे । मैंने भी तय किया कि इनके साथ ही मैं भी जहानाबाद चला जाऊँ और शाम की गाड़ी से पटना के लिए रवाना हो जाऊँ। बहनों ने भी मेरा समर्थन किया और राह खर्च के लिए कुछ पैसे दिये, जो उन्होंने अपनी जरूरतों के लिए संजो रखे थे। यह भी तय हुआ कि मेरे जाने के बाद पिताजी को बता दिया जाएगा।
             उन दिनों पूरे देश में इंदिरा गाँधी की तूती बोलती थी। क्या बूढ़े क्या जवान सभी उनके दीवाने थे। मेरा गाँव सवर्ण बहुल गांव है। आज जो लोग भाजपा के झंडा थामें मोदीजी के पीछे दौड़ रहे हैं, उनकी भक्ति में अपादमस्तक डूबे हुए हैं, तब इंदिरा गाँधी के मुरीद थे। वैसे, मेरे गाँव के कुछ लोग साम्यवादी एवं समाजवादी विचारों से प्रभावित थे और कांग्रेस के मुखर आलोचक थे। हलांकि वे भी इंदिरा गाँधी को देखने और सुनने को इच्छुक थे। इसलिए गांव से नौजवानों की एक बड़ी जत्था उनकी सभा में शामिल होने जा रही थी। तब मेरी उम्र राजनीतिक बातों को समझने की न थी। पर, इंदिरा गाँधी को देखने की ललक तो मेरे मन में भी थी ही और मेरे लिए तो यह एक पंथ दो काज वाली बात थी। सो मैं भी उनके साथ हो लिया।
          जहानाबाद के गाँधी मैदान में ( शायद महात्मा गॉंधी की हत्या के बाद हर शहर में अवस्थित मैदान को गाँधी मैदान से नामित कर दिया गया था) जबरदस्त भीड़ थी। पूरा गाँधी मैदान कांग्रेस के झंडों - बैनरों से सजा हुआ था। शहर के दीवारों पर इंदिरा गाँधी के पोस्टर चिपका दिये गये थे। पूरा शहर अपने प्रिय नेता के स्वागत हेतु गाँधी मैदान में एकत्रित था। भीड़ बड़ी बेसब्री से उनका इंतजार कर रही थी और जैसा कि हमारे नेताओं की लेट लतीफी की आदत है, उनके आने में भी काफी देरी हो रही थी। रह रहकर माईक से घोषणा होती कि उनका हेलिकॉप्टर उतर चुका है और वह बस चंद मिनटों में पहुँचने वाली हैं। तब भीड़ में एक अजीब किस्म का जोश भर जाता और लोग जोर - जोर से नारे लगाने लगते। लगभग दो घंटे की देरी से वह गाँधी मैदान पहुंची। मंच से काफी दूर हम खड़े थे। उन्होंने अपने कुछ मिनटों के संबोधन में क्या कहा, वह तो मैं नहीं समझ पाया। परन्तु,अंत में उन्होंने तीन बार जयहिन्द के नारे लगाई थी, जिसे उपस्थित भीड़ ने दुहराया था। यह वाकया आज भी याद है। साथ ही याद है उनकी वह छवि जो पोस्टरों में पहले ही मैंने देख रखी थी। खादी साड़ी में लिपटा छरहरा गोरा बदन। छोटे छोटे कटे हुए कंधे पर झुलते घुंघराले बाल, जिसकी एक लट ललाट के पास से पीछे तक सफेद। लंबी नासिका और औसत बड़ी आंखें। उनके मंच से उतरते ही भीड़ छंटने लगी। मैं भी अपने गांव के लोगों के साथ चल दिया। किंतु, मेरा गंतव्य अब गांव नहीं पटना था। अरवल मोड़ तक साथ चलने के बाद मैं उनसे अलग हो गया। कुछ देर बाद मैं जहानाबाद रेलवे स्टेशन पर था। टिकट काउंटर पर जाकर मैंने पटना का हाफ टिकट खरीद लिया। हाफ टिकट इसलिए कि मेरी उम्र अभी 12 वर्ष से कम थी। रेलवे लाइन को सीढ़ियों से पार कर मैं एक नंबर प्लेटफार्म से दो नंबर प्लेटफार्म पर चला गया और गया से चलकर पटना की ओर जाने वाली छ: बजिया ट्रेन का इंतजार करने लगा।
    उन दिनों उस रेल खंड पर कोयले से चलनेवाली सिर्फ पैसेंजर गाड़ियां ही चलती थीं। गया से चलकर पटना को जानेवाली तीन गाड़ियां थीं और उसी तरह पटना से चलकर गया को जानेवाली तीन गाड़ियां । शायद गाड़ियों के दो या तीन ही रैक थे जो आते - जाते थे। अक्सर आने जानेवाली गाड़ियों का मेल जहानाबाद में ही होता था। वहाँ इनके इंजन में पानी भी भरा जाता था।। इसलिए इनका ठहराव अन्य स्टेशनों की तुलना में यहाँ अधिक था। अमूमन शाम या रात की गाड़ी में उतनी भीड़ नहीं होती थी। पर, उसदिन तो प्लेटफार्म पर कहीं तिल रखने को भी जगह न थी। दोनों प्लेटफार्म खचाखच भरा था। इससे पूर्व मैं अपने पिता जी के साथ तीन बार पटना जा चुका था। पहली - दूसरी  बार जब मेरी उम्र 6 - 7 साल की थी और मैं सन्निपात जैसी बीमारी से ग्रस्त हुआ था और तीसरी बार जब शायद 9 वर्ष का था और फैलेरिया से मेरी दाईं जांघ में सूजन हो गई थी । बहरहाल, पटना की मेरी चौथी यात्रा थी।
                    जहानाबाद स्टेशन पर गाड़ी अपने नियत समय पर आ गई। किंतु, 5 मिनट देर से खुली और यह सिलसिला आगे बढ़ते हुए यहाँ तक पहुंचा कि गाड़ी स्टेशन पर ही नहीं हर एक गाँव के सामने रुकने लगी। फलतः जो गाड़ी आठ - साढ़े आठ बजे रात्रि तक पटना पहुँचती थी, लगभग मध्यरात्रि में पटना पहुँची।
पटना जंक्शन। सामने बड़ा सा गोलंबर। बाईं ओर टमटम और इक्का के घोड़े के लिए बना टीन के छप्पर वाला अस्थायी अस्तबल। तब अगम कुआँ, गुलज़ार बाग, गर्दनी बाग, खगौल, दानापुर या गांधी मैदान की ओर जाने के लिए रिक्शा के अलावा टमटम या इक्का ही आवागमन के साधन थे। पटना जंक्शन पर सन्नाटा पसरा था। स्टेशन के इमारत पर सामने रंगीन ट्यूब लाइट से निर्मित फिलिप्स एवं मर्फी ट्रांजिस्टर की आकृति वाले विज्ञापन जल - बुझ रहे थे। इन आकृतियों को देखकर रेडियो सीलोन से प्रसारित होने वाले " बिनाका गीतमाला " की याद सहज ही आ जाती थी और अमीन सयानी की गंभीर आवाज कानों में गूंजने लगती थी। आज भी स्टेशन की वह छवि मेरी आँखों में ज्यों का त्यों अंकित है। स्टेशन के बाहर बाईं ओर रिक्शा पड़ाव के पीछे, जहाँ आज भव्य महावीर मंदिर स्थित है, पीपल के पेड़ के नीचे एक पुराना महावीर मंदिर था। प्रत्येक मंगलवार की शाम वहाँ भक्तों की जबरदस्त भीड़ होती थी।
   बहरहाल, मेरा गंतव्य चिरैया टांड़ स्थित ईश्वर भवन था। वैद्यनाथ आयुर्वेद भवन से दस कदम आगे सड़क की बाईं ओर टी पी एस कॉलेज की ओर जाने वाली सड़क के मुहाने पर शायद 1936 में निर्मित ईश्वर भवन की इमारत आज भी मौजूद है। उस दिन मेरे लिए इतनी रात गए स्टेशन से चिरैयाटांड़ मोहल्ले में जाना संभव नहीं था। उस समय गुलजार बाग से गर्दनीबाग तक पूरे रेलखंड पर एक ही पुल था, चिरैयाटांड़ पुल। बाकी जगहों पर रेलवे क्रासिंग ( गुमटी) थी। इस ऐतिहासिक पुल की छवि इसलिए भी मेरे जेहन में अंकित है, क्योंकि 1962 में अपने पिता के कंधे पर बैठकर इस पुल के नीचे से गुजरने वाली उन गाड़ियों को मैंने देखा था, जो विशालकाय तोपों से सुसज्जित और आर्मी के जवानों से लदी - फदी पूरब से पश्चिम की ओर जा रही होती थीं। वह समय था जब भारत और चीन के बीच युद्ध छिड़ा हुआ था।
                       उसी चिरैया टांड़ पुल से होकर मुझे गुजरना था, जो स्टेशन से लगभग एक फर्लांग की दूर थी। आधी रात को चिरैया टांड़ तक पैदल जाने की मेरी हिम्मत न हुई। मैंने स्टेशन के प्रतीक्षालय में ही रात बिताने को सोचा। गाड़ी आने के आधे घंटे बाद स्टेशन सुनसान हो गया। मैं सहमा - सहमा इधर - उधर टहल रहा था। सर्दियों का समय था और मेरे बदन पर एक पैंट - बुशर्ट के सिवा कुछ नहीं था। तब हमारे पांव में चप्पल भी न होते थे। उस वक्त मुझे देखकर कोई भी यही सोचता कि मैं कोई लावारिस लड़का हूँ। तभी एक उचक्का किस्म का आदमी मेरे पीछे पड़ गया। मैं उससे दूर - दूर भागता रहा। वह मुझसे मेरे बारे में तरह तरह के सवाल पूछने लगा । कौन हूँ मैं.... कहाँ जाना है... आदि - आदि। उसके चेहरे से जाहिर हो रहा था कि वह चोर - उचक्का या जेबकतरा है। मुझे किसी आसन्न खतरे का अहसास होने लगा। मेरा दिल जोर - जोर से धड़कने लगा। मन ही मन खुद पर कोफ्त हो रही थी कि ऐसी जोखिम उठाया ही क्यों ! तभी एक सज्जन मुझे बचाने के लिए आगे  आए। शायद कुछ देर से वे उसकी गतिविधियों को देख रहे थे । उन्होंने उसे डांटकर भगाया और मुझे संरक्षण प्रदान किया। चार बजने को होंगे कि वह महाशय भी अपने गंतव्य की ओर निकल गए।
             मैं बहुत ही डरा हुआ था। सर्दी के कारण मैं थर्र - थर्र कांप कांप रहा था। तभी मेरी नजर स्टेशन के बाहर जल रहे अलाव पर पड़ी। मैं दबे पाँव धीरे धीरे चलकर अलाव के पास पहुंचा। कुलियों और रिक्शा चालकों ने वह अलाव जला रखी थी।  उनमें से एक ने मुझे टोकते हुए कहा, " ऐ लड़का, यदि आग तापना  है तो एक बंडल पत्तल लेकर आओ.... वो उधर देखो बिक रहा है... 4 आने में एक बंडल मिलेगा। " जिस तरफ उसने इशारा किया था, उधर मेरी दृष्टि गई। गंदे कपड़े में लिपटी कुछ आकृतियाँ सड़क किनारे पत्तलों तथा दतवनों की बंडल लिए बैठी थीं। ये आदिवासी महिलायें थीं जो जंगल से लाकर इन चीजों को यहाँ फुटपाथ पर बैठकर बेचती थीं। ये ही उनके आजीविका के साधन थे। वर्त्तमान में न तो शहरों में इनकी मांग है और न ही जंगलों पर इनका हक रह गया है। बहरहाल, मैंने अपनी जेब से एक चवन्नी निकाली और एक बंडल पत्तल लेकर जल रहे अलाव का साझीदार बन गया। अब मैं आगे बढ़कर आग का मज़ा ले रहा था। स्टेशन के बाहर जल रहे अलाव पर पड़ी। मैं दबे पाँव धीरे धीरे चलकर अलाव के पास पहुंचा। कुलियों और रिक्शा चालकों ने वह अलाव जला रखी थी।  उनमें से एक ने मुझे टोकते हुए कहा, " ऐ लड़का, यदि आग तापना  है तो एक बंडल पत्तल लेकर आओ.... वो उधर देखो बिक रहा है... 4 आने में एक बंडल मिलेगा। " जिस तरफ उसने इशारा किया था, उधर मेरी दृष्टि गई। गंदे कपड़े में लिपटी कुछ आकृतियाँ सड़क किनारे पत्तलों तथा दतवनों की बंडल लिए बैठी थीं। ये आदिवासी महिलायें थीं जो जंगल से लाकर इन चीजों को यहाँ फुटपाथ पर बैठकर बेचती थीं। ये ही उनके आजीविका के साधन थे। वर्त्तमान में न तो शहरों में इनकी मांग है और न ही जंगलों पर इनका हक रह गया है। बहरहाल, मैंने अपनी जेब से एक चवन्नी निकाली और एक बंडल पत्तल लेकर जल रहे अलाव का साझीदार बन गया। अब मैं आगे बढ़कर आग का मज़ा ले रहा था।
जब पौ फटने को आया और अंधेरा कुछ कम हुआ तो मैं चिरैया टांड़ पुल की ओर चल दिया। स्टेशन रोड में वीणा सिनेमा हॉल से आगे बढ़ा तो सड़क की बत्तियां बुझ गयीं। एकाएक बत्तियों के बुझने से बदन में सिहरन सी हुई। सड़कें अब भी खाली थीं। ठंड का अहसास और बढ़ गया। दांत किटकिटाते हुए, हथेलियों को आपस में रगड़ते हुए मैंने पुल पार किया और चिरैया टांड़ मोहल्ले में प्रवेश किया। अभी भी चाय की दुकानें जो अक्सर सुबह खुल जाती हैं, नहीं खुली थीं। चलते चलते मैं वैद्यनाथ आयुर्वेद भवन के पास पहुंचा, जिसके सामने एक सरकारी मिडिल स्कूल स्थित था। आयुर्वेद भवन का बड़ा वाला फाटक बंद था और वर्दीधारी दरबान अपनी ड्यूटी पर तैनात थे। थोड़ी ही देर में मैं ईश्वर भवन के दरवाजे की सांकल बजा रहा था। जाड़े की सुबह भला किसे बिस्तर छोड़ने की इच्छा होती है  ! पर, मैं अपनी माँ से मिलने को बेचैन था। शायद उस उम्र तक कभी भी मैं इतने दिनों तक माँ से दूर नहीं रहा था। मेरी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। कुछ देर दरवाजा खटखटाने के बाद मैं उल्टे पांव लौटकर पुनः चिरैया टांड़ पुल के पास आ गया। तबतक पुल के पास वाली चाय दुकान खुल चुकी थी। चूल्हे से बेतहाशा धुआँ निकल रहा था। मैं दुकान के अंदर पड़ी बेंच पर जाकर बैठ गया। चूल्हे के नीचले मुंह से पंखे की हवा देते हुए दुकानदार ने पहले तो मुझे ऊपर से नीचे तक गौर से निहारा, फिर पूछा, " चाय चाहिए...? " मैंने स्वीकृति में सिर हिलाया। चूल्हा प्रज्ज्वलित होने के बाद उसने चाय बनाने वाली डेगची चढ़ाया और चाय बनाना शुरू किया। पर, उसकी खोजी निगाह रह - रह कर मेरी ओर उठ जाती। एक दस वर्षीय बालक दरिद्रावस्था में सर्दियों की सुबह में इतना सबेरे आखिर क्यों भटक रहा है  ! उसकी जिज्ञासा बढती गई। अंततः उसने मुझसे कहा कि यदि मैं चाहूँ तो वह मुझे अपनी दुकान पर शरण दे सकता है। सुनकर मेरा माथा ठनका। जाड़े में भी बदन पसीने से तर - व - तर होने लगा। तो क्या मैं इतनी दयनीय स्थिति में हूँ  ? मैंने खुद को निहारा। बदन पर न स्वेटर, न चादर। सिर्फ़ हाफ पैंट और शर्ट। पैरों में चप्पल नहीं। बिखरे हुए बाल और धूल सना चेहरा। ताज्जुब नहीं जो दुकानदार ने यह अनुमान लगाया कि मैं घर से भागा हुआ हूँ और शायद काम की तलाश में हूँ। पर, मैंने उसके प्रश्न का कुछ हकलाते हुए जवाब दिया, " ऐसी कोई बात नहीं है। बस, समय गुजारना है सो चाय पीने के लिए बैठ गया। " आगे और क्या बातें हुई थीं, अब याद नहीं। चाय पीकर पुनः मैं ईश्वर भवन की ओर चल दिया। सुबह हो चुकी थी। सड़कों पर चहल - पहल शुरू हो गई थी। इस बार पहुंचा तो दरवाजा खुला पाया। तब ईश्वर भवन में नीचे के तल पर न्यू जरा चिल्ड्रेन स्कूल चलता था और ऊपर हमारे परिवार के लोग रहते थे। मैने जैसे ही ऊपर के तले पर पांव रखा सबसे पहले माँ ही दिखी। मैं उससे लिपटकर बेतहाशा रोने लगा। बाद में बड़े भाई साहब और बड़े चाचा जी से सामना हुआ। दोनों ने जोरदार फटकार लगाई। साथ ही मेरे साहस की दाद भी दी। उसके बाद तो घर से अकेले पटना आने - जाने का पासपोर्ट मुझे मिल गया।
                  ( ईश्वर भवन के बारे में फिर कभी)
( यादों के झरोखे से कुछ और अगले पोस्ट में) 

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