वह बूढ़ी अम्मा वर्षों पूर्व सुपुर्दे खाक हो चुकी होगी और यदि कहीं जन्नत है तो निश्चित ही वह जन्नत में जगह पाई होगी।
बात आज से लगभग 42 बरस पहले की है। तब मैं नौसेना की जहाज आईएनएस दर्शक में पदस्थापित था। वह एक सर्वे शिप थी। जहाज से हमारी सर्वे टीम महाराष्ट्र में रत्नागिरी पोर्ट की सर्वे करने गई थी। दो मोटर बोट के अलावा ट्रांसपॉन्डर यंत्र , टेंट , खाद्य सामग्रियां, पोर्टेबल जेनरेटर, बैटरियाँ, पोर्टेबल ट्रांसरिसिवर सेट और अस्थायी कैंप स्थापित करने के लिए आवश्यक सभी वस्तुएँ हम अपने साथ लेकर गए थे । सर्वे के लिए आवश्यक प्वाइंट सेट करने हेतु एक अस्थायी कैंप रत्नागिरी शहर के पास की एक पहाड़ी पर ट्रांसपॉन्डर रिमोट स्टेशन के रूप में स्थापित किया गया था, जिसका इंचार्ज मैं था। मेरे साथ दो नौसैनिक और थे। हमें हमारे खाद्य पदार्थों के साथ ही कैंप के लिए आवश्यक सारी वस्तुओं एवं इलेक्ट्रॉनिक यंत्रों के साथ एक पहाड़ी के ऊपर समतल मैदान में हेलिकॉप्टर द्वारा उतारा गया। हेलिकॉप्टर को उतरते देखकर उसे करीब से देखने के लिए उत्सुकता वश पहाड़ी की तलहटी में बसे गाँव के बच्चे दौड़ते हुए पहाड़ी पर चढ़ आए थे। हेलिकॉप्टर से जल्दी - जल्दी हमने अपने सामानों को उतारा और वह धूल उड़ाते चला गया। गाँव के बच्चे बड़े ही कौतुहल से हमें देख रहे थे । आखिर क्यों न देखें, हम हेलिकॉप्टर से जो उतरे थे ! उन दिनों हेलिकॉप्टर से किसी का आना - जाना काफी मायने रखता था , खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में। हमारे बारे में जानने की उनकी इच्छा प्रबल होती जा रही थी। परंतु,वे पूछने से हिचक रहे थे या हमारे कार्य में बाधा डालना उचित नहीं समझ रहे थे। हम अपने सामान का सूची से मिलान करते हुए उन्हें एक ओर रखते जा रहे थे। सारा सामान उतर चुका था। इस बीच गाँव के बच्चों ने हमारी वर्दी से यह जान लिया था कि हम फौजी हैं और इस पहाड़ी पर कैंप लगाने आए हैं। उनके जेहन में प्रश्न और भी थे। पर, हमारी व्यस्तता को देखते हुए उन्होंने नहीं पूछा। वैसे तो आज भी हमारे देश में फौजियों को सम्मान दिया जाता है, लेकिन तब की बात ही कुछ और थी। " जय जवान - जय किसान " नारे की अनुगूँज अभी फिजाओं में शेष थी।
सुबह के करीब दस बज चुके थे। हमने सबसे पहले अपने टेंट को खड़ा किया। उसके बाद सारी वस्तुओं को उठा - उठा कर टेंट में यथास्थान रखा। सब कुछ व्यवस्थित करने के बाद हमें खाना बनाने की चिंता हुई। इस बीच सारे बच्चे जा चुके थे। हमने पहाड़ी से खड़े होकर नीचे गाँव की ओर देखा । गाँव के बाहर एक कुआँ दीख रहा था। मैंने अपने साथियों से कहा कि पहले हम दो जन नीचे जाएंगे और गाँव के कुएं पर नहा - धोकर खाना बनाने के लिए पानी लेकर आएंगे। तब तक एक साथी कैंप की रखवाली करेगा और सब्जियां काटकर रखेगा।
मैं और सिन्हा अपनी तौलिया वगैरह लिये और दो बाल्टियों व मग लेकर नीचे गाँव की ओर चल दिये। पहाड़ी पर जहाँ हमने टेंट लगाए थे, उससे थोड़ा नीचे ढलान पर दाईं ओर हमें एक कब्रिस्तान दिखाई दिया। इससे यह अनुमान लगा कि नीचे जो गाँव है, उसके बाशिंदे मुसलमान हैं। आज जो नफरत की ऊंची दीवार देश के दो बड़े कौमों के बीच खड़ी कर दी गई है, तब ऐसा कुछ न था। पाड़ा, टोला, मोहल्ला या कॉलोनियां भले ही अलग - अलग थे। पर, हमारी संस्कृति साझी थी। हम एक दूसरे के पर्व त्योहार में शामिल होते थे। हम नाविकों के बीच तो ये फासले न के बराबर थे। जहाज में हमारे रहने के मेस, टॉयलेट, डाइनिंग हॉल , कार्य स्थल सब एक ही थे। खैर, इससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता था कि कुआँ किस धर्म के मानने वालों की है। हमें तो नहाने और पीने के लिए पानी की जरूरत थी।
जब हम दोनों नीचे पहुंचे, सामने पक्का जगत वाला एक बड़ा सा कुआँ था, जिसके एक ओर कुछ औरतें कपड़े धो रही थीं और दूसरी ओर कुछ औरतें पानी भर रही थीं। हमने एक दूसरे की ओर देखा। हम दोनों की आंखों में एक ही प्रश्न था -- इनके रहते हुए हम यहाँ कैसे नहा पायेंगे ? उस गाँव की तहज़ीब से हम वाकिफ नहीं थे । अतः भयभीत थे कि कहीं दो अजनबियों को औरतों के बीच नहाते देखकर लोग बुरा न मान जाएं !
दूर खड़े दो व्यक्ति हमें घूर - घूर कर देख रहे थे। हमारे पांव अनायास उनकी ओर बढ़ गए। उन्होंने शायद हमारी मजबूरी भांप ली। उनमें से एक ने पूछा, " नहाने आए हो। "
हमने " हाँ " में सिर हिलाया।
" फौजी हो...? "
हमने पुनः " हाँ " में सिर हिलाया। उसने हमें अपने पीछे आने को कहा। हम उसके पीछे - पीछे हो लिये। वह एक लंबी दीवार के पास जाकर रुक गया। दीवार के पीछे छोटे - छोटे कमरे बने हुए थे, जो शायद सामूहिक और सार्वजनिक स्नानागार थे। परंतु, महीनों तक उपयोग में नहीं रहने के कारण धूल से अंटे पड़े थे। साथ ही मकड़ी के जाल से ढके हुए थे। उन्हें दिखाते हुए उसने कहा कि इनमें से एक को साफ कर के हम उसका उपयोग कर सकते हैं। उसने यह भी बताया कि इन्हें हज यात्रियों के लिए बनाया गया है। हज यात्रा के दिनों में ये साफ - सुथरे होते हैं और यात्रियों द्वारा इनका उपयोग किया जाता है। हमारे पास न तो उसे साफ करने का समय था और न वह जगह हमें पसंद आ रहा था। कुएं से उसकी दूरी भी तकरीबन आधा किलोमीटर थी। हमारी खामोशी ने हमारे निर्णय को उसके सामने रख दी। हम लौटकर पुनः उस कुआँ के पास आ गए। कुआँ से थोड़ी दूरी पर छोटे - छोटे पेड़ों और कंटीली झाड़ियों की एक झुरमुट थी। हमने तय किया कि हम पानी भरकर वहाँ ले जायेंगे और वहीं झुरमुट में नहायेंगे। और, हमने ऐसा ही किया। नहा - धोकर हमने बाल्टियों में पानी भर लिया और अपने कैंप की ओर चल दिए। पहाड़ियों वाले कैंप में सबसे ज्यादा परेशानी पानी की ही होती है। पर, वह मसला यहाँ सुलझ चुका था।
शाम में हमने पहाड़ी का मुआयना किया। पहाड़ी की एक ओर गाँव था, बाकि तीन तरफ घने जंगल थे। शाम को खेलने आए बच्चों को यह जानकर हैरत हो रही थी कि हम रात में भी यहीं रहेंगे। उन्होंने सुनी - सुनाई कई बातें हमें बताई। उनके अनुसार जंगली जानवर, खासकर भालू और सुअर वहाँ आते रहते हैं। भालू कभी - कभी और जंगली सुअर अक्सर ही। सांपों के भी आने की बात कही। सांपों से बचने का उपाय हमने कर लिया था। टेंट के चारो तरफ हमने " स्नेक " पिट बना लिया था। पश्चिम में सूरज का चक्का जैसे ही लाल हुआ, बच्चे अपने घर की ओर भागे। हमने जेनरेटर स्टार्ट किया और खाना बनाने की तैयारी शुरू कर दी। चारो तरफ घुप्प अंधेरा औरो सन्नाटा पसरा हुआ था। नीचे गाँव की बत्तियां टिमटिमा रही थीं ।
सुबह जब हम नित्य क्रिया से निवृत्त होकर नाश्ता बनाने की तैयारी कर रहे थे कि टेंट के पीछे किसी के पैर की आहट हुई। कुछ देर तक जब कोई टेंट के दरवाजे पर नहीं पहुंचा तो मैंने आवाज दी -- " कौन है बाहर...? "
" जी....हम हैं ... आपके लिए नाश्ता और पानी लाए हैं । "
आवाज किसी औरत की थी ।
मैंने थोड़ी रौबदार आवाज में कहा, " जो भी हो, सामने आओ। "
सहमते हुए दो महिलाएँ हमारे सामने प्रकट हुईं। एक महिला के एक हाथ में टिफिन बॉक्स और दूसरे में पानी से भरी छोटी बाल्टी थी और दूसरी के सर पर पानी से भरी गगरी थी। एक की उम्र लगभग 38 - 40 वर्ष होगी और दूसरी की 22 - 23 वर्ष । दोनों डरी - डरी, सहमी - सहमी सी थीं। उनकी नजरें झुकी हुई थीं।
" यह सब क्या है, बहन जी ? " --- मैंने प्रौढ़ महिला से पूछा। ।
वे दोनों घबरा गईं। उन्हें लगा कि उन्होंने कोई भारी गलती कर दी है। प्रौढ़ महिला ने हकलाते हुए जवाब दिया, " जी..कल जब से अम्मा को आप लोगों के आने की खबर मिली है , वह अल्लाह से आपकी सलामती की दुआ मांगती रहती है। उसने आपलोगों के लिए नाश्ता और पानी भेजा है। मैंने लाख समझाने की कोशिश की, पर उसने मेरी एक न सुनी ... जिद पर अड़ गई... "
" अम्मा कौन ? "
" मेरी सासु माँ ...। "
बड़ी अजीब बात थी । मैंने अपने दोनो साथियों की ओर देखा और इशारे से पूछा कि क्या करें? उन्होंने स्वीकृति दे दी।
मैंने उन्हें समझाते हुए कहा, " देखो बहन जी, फिर कभी ऐसा मत करना। चूंकि इतने प्यार से अम्मा ने भेजा है और इतनी परेशानी उठाकर आप ले आई हो, इसलिए रख ले रहा हूँ , वरना वापस कर देता । हम फौजी हैं और हम जहाँ भी कैंप लगाते हैं, जरूरत के सारे सामान साथ लेकर आते हैं। " -- कहते हुए हमने उनसे टिफिन बॉक्स लेकर साथियों को दे दिया। उन्होंने अपने बर्तनों में उन चीजों को रख लिया। पानी भी हमने अपनी बाल्टी में रख लिया और उन्हें धन्यवाद के साथ यह हिदायत दी कि आगे फिर कभी ऐसा न करें। सहमते - सकुचाते वे दोनों चली गईं। उस अजनबी अम्मा ने हमारे लिए रोटी, सब्जी और तली हुई कुछ मछलियाँ भेजी थी।
दूसरी सुबह वे दोनों फिर उसी तरह नाश्ता - पानी लेकर पहुँच गई। मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया। फौजियों के लिए हुक्म उदूली बहुत बड़ी बात होती है और उन्होंने वही किया था। किन्तु, आज वे और ज्यादा भयभीत तथा सहमी हुई थी। मैंने डांटते हुए कहा, " कल आपको मैंने क्या कहा था , बहन जी ? समझ में नहीं आया था क्या? चलिए, वापस जाइए और अपनी अम्मा जी से बोल दीजिए कि हमने उनका नाश्ता लेने से इनकार कर दिया है। "
सिर पर गगरी लिए हुए लड़की काफी डर गई थी। वह मुड़कर जाने लगी। लेकिन, प्रौढ़ महिला खड़ी रही। उसने उसे रोकते हुए कहा -- " रुको सबीना .... भाई साहब! मेरी अम्मा को पता नहीं क्या हो गया है !....सुबह बिस्तर से उठते ही वह चिल्लाने लगती है .... अरे बहू, उनके लिए रोटियाँ बनाई या नहीं.?... पहले उनके लिए नाश्ता बना लो.... बाद में घर का काम करती रहना । "-- कहते - कहते उसकी आंखें भर आईं। उसने कांपती आवाज में कहा, " आज शाम को आकर आप ही उसे समझा दीजिए न, भइया ! शायद आपकी बात वह मान जाए। *
" देखो बहन, वैसे तो हम जरूरत के अनुसार ही सिविल इलाके में जाते हैं। किसी सिविलियन के घर तो हरगिज नहीं जाते। लेकिन, जब आपने भाई कहा है तो आपके घर अवश्य आऊंगा। जाइए , अपनी अम्मा को भी बता दीजिए । "
मैं सोचने लगा कि यह क्या आफत है ! कितनी ही जगहों पर हमने कैंप लगाए थे, पर ऐसी बात कहीं न हुई थी। मैंने नाश्ता - पानी रख लिया। उसनधधध्ध्ध उसनधधध्ध्ध उसनधधध्ध्ध ध् बूढ़ी अम्मा से मिलने की मेरी इच्छा अब और भी तीव्र हो गई थी । मैं उस कारण को जानना चाहता था, जिसने उन्हें हमारे लिए इतनी चिंता करने को मजबूर कर दिया था।
शाम को ठीक चार बजे जब बच्चे खेलने के लिए पहाड़ी पर चढ़ रहे थे, मैं और तापस सिन्हा नीचे उतर रहे थे। हमें गाँव में घुसते देख एक किशोर बालक हमारे साथ हो लिया था। उसकी सहायता से ही हम उस अजनबी माँ के घर पहुंच पाए थे। सांकल बजते ही दरवाजा खुला। सामने वही महिला थीं। उन्होंने हमारा स्वागत करते हुए अंदर आने को कहा । हम आंगन में दाखिल हुए और वहाँ पहले से रखी कुर्सियों पर बैठ गए। हमने चारो ओर नजर घुमाकर उस घर का मुआयना किया। साधारण सा घर था। निम्न वित्तीय परिवार के जैसा। पर, साफ - सुथरा, सबकुछ करीने से रखा हुआ। कुछ ही देर में ममतामयी अम्मा हमारे सामने थी। सफेद बाल, पोपला मुंह, गाल भीतर को धंसे हुए,चेहरे पर झुर्रियाँ और झुकी कमर। झुक कर चलती हुई वह सामने के कमरे से निकली और बरामदे में बैठ गई। हमने आगे बढ़कर उनके चरण स्पर्श किये। वह चमकती आंखों से हमें देख रही थी । उसने अपनी बहू को हमारे खाने के लिए कुछ लाने का आदेश दिया । मैं अपलक उन्हें देखे जा रहा था । वह भी वगैर कुछ बोले हमें देख रही थी। उनके चेहरे पर बेपनाह खुशी झलक रही थी। हमारे आने की खबर सुनकर पास - पड़ोस से कुछ औरतें और बच्चे उनके घर आ गए थे। कुछ ही क्षण में तीन कटोरे में दूध और चूरा लाकर टेबल पर रख दिया गया। साथ में तीन गिलास पानी के। शायद सब कुछ पहले से तैयार रखा हुआ था। पर, मेरा सारा ध्यान अम्मा पर केंद्रित था। मैंने उनसे पूछा कि पिछले दो दिनों से आखिर वे हमारे लिए नाश्ता क्यों भेज रही थीं।
वह कुछ देर खामोश रहीं। उसके बाद अपनी टूटी - फूटी हिंदी में उन्होंने जो कहा, उसका मतलब यह था कि ऐसा वह अपने स्वार्थ में कर रही थी। उनका इकलौता बेटा काम के सिलसिले में विदेश चला गया है और उनकी मान्यता है कि यदि वह यहाँ किसी परदेशी को खाना - पानी देगी तो वहाँ परदेश में उनके बेटे को भी कोई खाना - पानी देगा। हलांकि, हकीकत में ऐसा कभी नहीं हो सकता। किन्तु, यह एक माँ की आस्था और विश्वास का सवाल था और मैं उनकी आस्था पर चोट नहीं करना चाहता था। अतः मैं खामोश रहा। उनके आग्रह पर हमने दूध - चूरा खाना शुरू कर दिया। खाने के बाद कुछ इधर - उधर की बातें होती रही। उन्होंने हमारे घर - परिवार के बारे में पूछा।वैसे हमारे बीच कहने - सुनने को और कुछ नहीं था। हमने उनसे आग्रह किया कि वे सुबह सुबह नाश्ता भेजना बंद कर दें, क्योंकि यह हमारे अनुशासन के खिलाफ है। उनके चेहरे की चमक अचानक गायब हो गई और वहाँ मायूसी छा गई। हमने उनसे इजाजत ली और उनका आशीर्वाद लेकर बाहर आ गए। उनकी बहु हमें छोड़ने बाहर तक आई। बाहर आकर मैंने उसे अपनी मजबूरी बताई । हमारे लिए उसके द्वारा लाया गया नाश्ता - पानी स्वीकार करना कैंप के नियम के खिलाफ था। मैंने उससे भी आग्रह किया कि वह अम्मा को अच्छी तरह समझा दे कि वे जिद न करें और शुक्र है कि ऐसा ही हुआ।
परन्तु, इसके बाद, यदि आज की सोशलमीडिया के शब्द उधार लेकर कहूँ तो इनके घर आने की बात वायरल हो गई। हम जैसे ही उनके घर से बाहर आए एक और महिला ने जिद कर दिया कि हम उनके घर भी चलें। कम से कम एक कप चाय ही पी लें। मजबूरन उनके घर भी हमें जाना पड़ा।
तीसरे दिन सुबह एक नौजवान हमारे पास आया और कहा कि हम झाड़ियों के बीच नहाने के बजाय उसके घर के अहाते में चलकर नहायें। वहाँ उसका निजी कुआँ था और कपडे सुखाने के लिए उचित व्यवस्था भी । हमें उसका सुझाव पसन्द आया और हम उसके साथ ही नहाने तथा पानी लाने चले गए। वहाँ सचमुच में नहाने की सुविधा अच्छी थी। इस बीच उस लड़के ने हमें गाँव की संरचना के बारे में बताया। पहले हम गाँव के जिस हिस्से में जा रहे थे, वह मुस्लिम पाड़ा था और अब हम जहाँ आए थे, वह हिन्दू पाड़ा था।हमारे देश की यह विडम्बना है कि हमारे गाँव तथा शहरों की आबादी जाति - धर्म के आधार पर बंटी होती है। हलांकि, हम फौजियों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। सुविधा के कारण हमने वहाँ नहाना स्वीकार कर लिया था और हम वहीं से पानी भरकर ले जाने लगे थे।
दिन भर तो हम अपने काम में व्यस्त रहते थे। शाम में टाईम पास करने के लिए या तो पहाड़ी पर खेलने आए बच्चों के साथ खेलते, उनका खेल देखते या टहलते हुए पहाड़ी से उतरकर गाँव की ओर निकल लेते, जहाँ शाम में सड़क किनारे सब्जियों और मछलियों का अस्थायी हाट लगता था। वैसे तो हम डिब्बा बंद दूध, मीट व मछलियाँ जहाज से लेकर आते थे। किंतु, कभी - कभी ताजा सब्जियां और मछलियाँ हाट से भी खरीद लिया करते थे।
हमें कैंप में आए करीब दस दिन बीत चुके थे। सर्वे का काम लगभग पूरा हो चुका था। पोर्ट वाले मुख्य कैंप से मैसेज आया कि अगले दिन सुबह 9 बजे हेलिकॉप्टर हमें लेने आ रहा है। मेरे साथियों ने उस दिन रात में मछली खाने की इच्छा व्यक्त की। अतः शाम को मैं मछली खरीदने हाट की ओर गया। जब मैं वहाँ पहुंचा तो मछली बेचती हुई सबीना दिख गई जो सिर पर पानी भरी गगरी लेकर दो दिन हमारे कैंप में गई थी। मुझे देखकर वह सहम गई और सफाई देती हुई बोली --- " आज दादा नहीं है, इसलिए मैं.......! "
" अरे, यह तो अच्छी बात है। घर का काम करने में कैसा शर्म ! चलो, मुझे एक तीन पाव की ताजा मछली दे दो। "
उसने एक मछली का वजन किया और उसे काटने लगी। मैंने उससे अम्मा और उनकी बहू का हाल - चाल जाना और अगले दिन हम वापस चले जायेंगे, यह भी उसे बताया। उसने कहा कि वह भाभी से यह बात बता देगी। मैंने हंसते हुए कहा -- " जरूर बताना और यह भी कि कल मैं उनके नाश्ता - पानी का इंतजार करूँगा। पता नहीं, फिर कभी हम यहाँ आएं या नहीं। "
उसने पोलीथीन की थैली में कटी हुई मछली के टुकड़े डालकर मुझे पकड़ा दी और पैसे लेने से इनकार करने लगी। बहुत समझाने के बाद उसने पैसे लिये।
दूसरे दिन सुबह हमने अपने टेंट, कैंप खाट तथा अन्य सारे सामान समेट कर कई बंडल बना लिये। हेलिकॉप्टर के उतरते ही गाँव के बच्चे पहाड़ी पर दौड़ते हुए आने लगे। मैं सबीना और भाभी का इंतजार कर रहा था। पहली खेप में मैंने अपने एक साथी को कुछ सामान के साथ भेज दिया और हेलिकॉप्टर के पुनः आने का इंतजार करता रहा। मेरी आँखें बार - बार गाँव की ओर उठ जातीं। पर, सबीना या भाभी का कहीं अता - पता नहीं था। हेलिकॉप्टर फिर आ गई। मैंने सिन्हा के साथ मिलकर बैटरियां आदि सामान रखना शुरू किया। मैं आखिरी खेप में जाना चाहता था, क्योंकि मुझे पूरा विश्वास था कि नाश्ता लेकर सबीना या भाभी जरूर आएगी। लेकिन पायलेट साहब ने मुझे चलने को कहा। मैंने आखिरी बार गाँव की ओर देखा और मायूस होकर हेलिकॉप्टर में सवार हो गया। चूंकि सिन्हा को यह पता था कि मैं अम्मा की रोटियों का इंतजार कर रहा हूँ, उसने मुस्कुराते हुए धीरे से कहा, " कभी खुद ही मना करते हैं और कभी....... जाइए, वह नहीं आनेवाली...। "
मेरे आने के साथ ही नेवी का ट्रांसपोर्ट भी आ चुका था। हेलिकॉप्टर से सामान उतार कर हम उन्हें ट्रांसपोर्ट में लोड करने लगे । मैं और मेरे दूसरे साथी इस काम में जुट गए। हेलिकॉप्टर आखिरी ट्रिप के लिए जा चुका था। सामान लोड करने में हम इस तरह व्यस्त हुए कि मैं नाश्ते वाली बात लगभग भूल चुका था। तभी हेलिकॉप्टर के आने की आवाज आने लगी। कुछ ही क्षण बाद वह नीचे उतर रहा था। मेरी नजर अनायास उस ओर उठ गई। आशा के अनुरूप मैंने सिन्हा के हाथ में एक छोटी सी पोटली देखी। वह मुझे देखकर मुस्कुरा रहा था। जब मैं उसके पास पहुंचा तो उसने वह पोटली मेरी ओर बढ़ा दिया और हंसते हुए कहा, " कुमार जी, यह रहा आपका तोहफा । "
" तोहफा नहीं, अम्मा और भाभी का आशीर्वाद ! "
( यादों के झरोखे से कुछ और अगले पोस्ट में)
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