दिसम्बर में ठंड तो यूँ भी बढ़ जाती है। ऊपर से दो दिनों से बादल छाए रहने और रह रहकर बूंदाबांदी होने से ठंड और भी बढ़ गई थी। शाम में जब आकाश मेघ मुक्त हुआ, पछुआ हवा ने ठंड को दोगुनी बढ़ा दिया। मजदूरों की कच्ची बस्ती में ठंड से लड़ने के लिए जगह जगह अलाव जलने लगे। ऐसे ही एक अलाव के पास बैठा मनुआ दिल्ली बॉर्डर पर एकत्रित हो रहे आंदोलनकारी किसानों के बारे में सोच रहा था। अभी तो ठंड शुरू ही हुआ है , आनेवाले दिनों में जब हिमालय से होकर ठंडी हवा आएगी तो इन किसानों की हालत क्या होगी! पिछली बार भी सैंकड़ों किसानों ने शहादत दी थी। अंततः सरकार ने तीनों काला बिल वापस लिया था और न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करने का वादा किया था। पर, आंदोलन की वापसी के बाद सरकार कान में तेल डालकर बैठ गई। और, ऐसा हो भी क्यों नहीं,जब मजदूर - किसान विरोधी नीतियों को लागू करने के बाद भी चुनाव जीते जा सकते हैं तो उनके हित के बारे में भला कोई क्यों सोचे !
वह अभी इन्हीं विचारों में खोया हुआ था कि आस - पड़ोस के कई लोग अलाव को घेरकर बैठ गए। तभी गमछा का मुरेठा बांधे मोटिहा का चादर ओढ़े पांडे आ धमका । आते ही उसने " जय श्रीराम " का जयकारा लगाया और मनुआ की ओर कनखी से देखा। मनुआ ने पांडे को प्रणाम किया और पूछा, " का बात है पांडे भइया, बड़ा चहक रहे हो ? कंपनी ने दरमाहा बढ़ा दिया है का ? "
" दूर बुड़बक, तुमको तो हमेशा बोनस और दरमाहा की ही चिंता रहती है। अरे, कभी देश - दुनिया की चिंता भी कर लो। मालूम है कि अपने बगल के देश में हमारे भाइयों के साथ क्या क्या जुलूम हो रहा है ? "
" कहाँ ? अच्छा... बांग्लादेश में ? "
" हाँ भाई, सुन सुन के खून खौल रहा है। इसी बांग्लादेश को हमने कितना मदद किया था। अपना खून बहाकर इन्हें आजाद कराया था और आज वही लोग नमकहरामी कर रहे हैं। "
" अपने देश के साथ तो वैसा कुछ नहीं किया है भइया , वरना हमारे प्रधानमंत्री अब तक चुप बैठते का ...."
" अरे , देश के साथ नहीं, हमारे हिंदू भाइयों के साथ हो रहा है और हम हैं कि ......। "
" भइया! जब भी कौनो देश में धार्मिक कट्टरपंथ सत्ता पर हावी हो जाता है तो अल्पसंख्यकों के साथ यही होता है। उनका पहला निशाना अल्पसंख्यक ही होते हैं। अपने यहाँ ही देख लीजिए। ग्राहम स्टेंस से लेकर पहलू खाँ तक......। "
" हम जानते थे कि तुम यही कहोगे । अरे मनुआ ! कुछ तो शरम करो तुमलोग। जिनके द्वारा हम अतीत में प्रताड़ित हुए थे , हमारे धर्म स्थलों को तोड़ा गया था और अब तो अपनी संख्या बढ़ाकर वे लोग हमें अल्पसंख्यक बना देना चाहते हैं । फिर भी तुमलोग उनका ही पक्ष लेते हो ? " --- इतना कहते कहते पांडे का चेहरा सख्त और कठोर हो गया।
पहले भी धार्मिक मसले पर इनमें हल्का - फुल्का नोक - झोंक होते रहता था। परंतु, उसमें इतनी तल्ख़ी नहीं होती थी। मनुआ ने महसूस किया कि पांडे का मस्तिष्क अब पूरी तरह विषाक्त हो चुका है। अभी वह अपनी बात के समर्थन में कुछ तर्क देता कि पास बैठे हरखू काका ने पांडे का समर्थन किया --- " हम तो ई भी सुने हैं कि ई लोग का एक ठो वक्फ बोर्ड है, जो न जाने कब से जहाँ - तहाँ जमीन कब्जा करता रहा है। अब तो उसके पास हजारों - लाखों एकड़ जमीन है। "
हरखू काका जैसे बुजुर्ग और अनुभवी व्यक्ति के मुंह से यह सब सुनकर मनुआ समझ गया कि समाज में किस स्तर तक जहर फैलाया जा चुका है। वक्फ बोर्ड के मसले पर जो थोड़ी जानकारी रखता था, वह अभी कहता ही कि पांडे के बगल में बैठा किशोरी ने भी हरखू का समर्थन किया -- " काका ठीके कह रहे हैं। हमने भी सुना है। "
मनुआ ने प्रतिवाद करते हुए कहा -- " वक्फ बोर्ड के बारे में हमलोग सुनी - सुनाई बात कर रहे हैं। अगर यह संस्था जमीन लूट रही होती तो अबतक की सरकारें इसे बैन नहीं कर देतीं ? फिर भी यदि उसके पास गैरकानूनी तरीके से अर्जित संपत्ति है तो सरकार कानून के माध्यम से उसे छीन ले। "
" हाँ तो छीनेगी ही सरकार। ई सरकार पहले वाली सरकारों जैसी नहीं है, मनुआ ! ई राष्ट्रवादी सरकार है , जिसका कि पूरी दुनिया में डंका बज रहा है। "
" हाँ भइया, हमारे प्रधानमंत्री के सामने तो बड़ी बड़ी शक्तियां सर झुकाती हैं। लोग कहते हैं कि इन्होंने रशिया और यूक्रेन का युद्ध भी कुछ घंटों के लिए रुकवा दिया था, भले ही अपने देश के एक राज्य मणिपुर में दो जातियों के बीच चल रही लड़ाई को वे अबतक नहीं रोक पाए हैं। "
मनुआ के बगल में बैठे श्यामल दास को इन बातों से खीझ होती है। वह उबल पड़ता है -- " पांडे भइया ! कब तक झूठ के झूले पर झुलते रहोगे? दुनिया में डंका बजाने वाला प्रधानमंत्री महंगाई पर कब रोक लगाएगा ...? बेरोजगार नौजवानों को रोजगार कब देगा... ? पब्लिक सेक्टर को औने - पौने में बेचना कब बंद करेगा..? किसानों को उनके फसलों का उचित मूल्य देने की व्यवस्था कब करेगा...? मजदूरों के अधिकारों को छीन कर उन्हें बंधुआ मजदूर में बदलने की प्रक्रिया कब बंद करेगा...? "
श्यामल की बातें ऐसी थीं, जिसका कोई जवाब पांडे के पास नहीं था। उसने खिसक जाना ही बेहतर समझा।
" अरे भाई ! तुमलोग इन्हीं छोटी - छोटी बातों में उलझे रहो, चाहे देश फिर से एक बार विधर्मियों के हाथों में गुलाम हो जाए! "__ कहते हुए पांडे उठकर चल दिया।
मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र! सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं। इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...
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