मनुआ - 62
मनुआ के घर के सामने कल शाम में भी अलाव जला हुआ था। कई लोग उसे घेरे बैठे थे। किंतु, कल अलाव से ज्यादा गर्मी शहर के माहौल में थी। अब तक मोदी को विश्व के नेता मानने वाले भीखू काका भी अच्छा खासा नाराज दिख रहे थे। नाराज़गी का कारण मोदी सरकार के गृहमंत्री अमित शाह द्वारा राज्यसभा में बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर पर की गई टिप्पणी थी । शोषित, वंचित तथा दलित समुदाय इसे बाबा साहेब का अपमान के रूप में देख रहा था ।
" गृहमंत्री ने बाबा साहेब का मजाक उड़ाकर अच्छा नहीं किया है। " -- भीखू काका ने दुखी स्वर में कहा।
" इहे लेकर तो पूरे देश में बवाल मचा है, चाचा ! "-- रामदास ने अलाव में फूंक मारते हुए कहा।
" भीखू काका ! ई आक्रमण बाबा साहेब के बहाने भारत के संविधान पर है । काहे कि ई लोग जो आज सरकार में हैं, कभी भी इस संविधान को अपना माना ही नहीं । जब बाबासाहेब ने देश के सामने संविधान पेश किया था तभी इनके पूर्वजों ने कहा था कि ई संविधान में कुछ भी भारतीय नहीं है। असल में ई लोग चाहते थे कि मनुस्मृति को ही भारत का संविधान बना दिया जाए। ये ही से ई लोग बराबर इस पर चोट करते रहते हैं। "
अभी अभी आकर बैठे पांडे को मनुआ की बात चुभ गई। उसने तत्काल हस्तक्षेप किया, " देख मनुआ! आलतू - फालतू बात करके लोगों को भड़काओ मत। हमरे गृहमंत्री ने बाबा साहेब का कोई अपमान नहीं किया है। ई तो विपक्षी पार्टी के नेता लोग बात का बतंगड बना रहे हैं।....और, जहाँ तक संविधान को बदलने की बात है, वह तो हमरे पहिला प्रधानमंत्री नेहरू ने 1951 में ही इसे बदलना शुरू कर दिया था। "
" पांडे भइया! उसे बदलना नहीं कहते, समय के अनुसार देश और समाज हित में संशोधन करना कहते हैं। वैसे, अपना संविधान परिवर्तनशील है, भइया! किंतु , उसके बुनियादी ढांचे को बदलने की इजाजत संविधान हमें नहीं देता ....और ये बुनियादी ढाँचा टिका है-- समता, स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता और बंधुत्व के मजबूत खंभों पर ।....जहाँ तक पहला संशोधन का सवाल है, इस संशोधन द्वारा नेहरू ने संविधान में परिवर्तन करके जमींदारी खत्म करने वाले कानूनों को वैधता प्रदान किया था।उसवक्त सभी लोग जमींदारी की खात्मा चाहते थे। उसके बाद इस तरह के बहुत सारे संशोधन हुए हैं। किंतु, स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता, समता और बंधुत्व हमारे संविधान की आत्मा हैं भइया ! इन्हें बचाना ही संविधान को बचाना है....और यह सरकार इन्हीं पर लगातार चोट कर रही है। "
" अरे बुड़बक, ऐसा क्या कर रही है सरकार ? वह तो 84 करोड़ लोगों को दो वक्त की रोटी दे रही है। विदेशी शक्तियां नहीं चाहती हैं कि हमारा देश शक्तिशाली हो और ये विपक्षी दल उन्हीं के हाथों में खेल रहे हैं। बाकी ई सब विपक्षी दलों का अनर्गल प्रलाप है, समझे। ई देशभक्तों की सरकार है.....। "
" अच्छा भइया! बंटेंगे तो कटेंगे..... आग लगाने वाले को कपड़े से पहचान सकते हैं.... कांग्रेस के लोग हमारी संपत्ति को छीनकर अधिक बच्चे पैदा करने वालों को दे देंगे..... ई सब बात समाज के एक खास धरम के लोगों को टारगेट नहीं करती है , बोलिए ? ...और, ई बात कोई साधारण कार्यकर्ता न कहता है भइया , देश के प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री कहते हैं .....और ऐसा कहना सीधे - सीधे हमरे संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर चोट करना नहीं है ? "
" हं तो तुष्टिकरण कर के ऊ लोगन को माथे पर बैठाए रक्खो .! एकदिन ऐसा आएगा कि अपने ही देश में अल्पसंख्यक बन जाओगे...। " -- झुंझला कर बोलते हुए पांडे उठा और चल दिया।
आजकल मनुआ की बातों से भीखू काका बहुत प्रभावित रहने लगे हैं। उन्होंने मनुआ से पूछा --- " ई कुल कहाँ जाकर सीखते हो, मनुआ ? "
" जहाँ जाकर सीखता हूँ, वहाँ आप भी चलिएगा काका ? "
" क्यों नहीं मनुआ! अरे , बाबासाहेब का संविधान नहीं बचा तो हम दलित, वंचित, शोषित लोगों का क्या होगा, ई सोचिए के सिहरन होती है।"
" तो कल शाम में 5 बजे नया मोड़ पर आयोजित प्रतिरोध सभा में आइए। "--- मनुआ ने मुस्कुराते हुए कहा।
अलाव के पास बैठे कई लोगों ने सभा में आने का वादा किया।
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