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मनुआ - 63

मनुआ - 63

ठंड से ठिठुरती दिल्ली में विधानसभा चुनाव की घोषणा के साथ ही थोड़ी गरमी आने लगी है। किन्तु, मनुआ को घोर आश्चर्य हो रहा है कि सड़क किनारे जल रहे अलाव के चारो ओर बैठे लोगों के बीच बहस का मुद्दा महंगाई और बेरोजगारी न होकर शीशमहल और राजमहल है। "आप " और " भाजपा" के नेताओं के बीच इसे लेकर जूतम - पैजार जारी है। इस मुद्दे पर सारे लोग दो खेमों में बंटे हुए हैं। नया शहर, नये लोग और नई बहस। मनुआ के लिए सबकुछ नया ही है। वह अभी परसों ही तो आया है अपने भतीजे के पास, जो फरीदाबाद के एक छोटे से कारखाने में काम करता है और पास के मजदूर कॉलोनी में किराए के घर में रहता है। लगता है कि पतली गलियों और बजबजाती नालियों वाली इस कॉलोनी के लोगों को चुनने के लिए बस ये दो ही विकल्प हैं, एक शीशमहल वाला और दूसरा राजमहल वाला। बहस अपनी उठान पर है। 
--- अब और क्या चाहिए हमें..? केजरीवाल ने स्कूलों और मोहल्ला क्लिनिक की व्यवस्था की, मुफ्त बिजली और पानी दिया.... और तो और महिलाओं के लिए मुफ्त बस सेवा और बुजुर्गों के लिए मुफ्त तीर्थयात्रा.....! 
---- सो तो ठीक है भइया, पर अपने को जो आम आदमी का मुख्यमंत्री कहता था, वह आज करोड़ों का शीशमहल में रहेगा.... यह कैसी सादगी है? आखिर पैसा तो हमारे ही टैक्स से आता है! 
---- अरे तो वह कौन सा अपना मकान बना रहा है , मुख्यमंत्री का आवास बना रहा है... जो भी मुख्यमंत्री बनेगा वह रहेगा । इसमें हो - हल्ला की क्या बात है ? उधर उनकी टपोरी नहीं दिख रही है क्या ? कहकर आए थे कि सबके खाते में 15 लाख डालेंगे...... 2 करोड़ नौकरियां देंगे ... हवाई चप्पल वालों को हवाई जहाज पर उड़ाएंगे , ये सब का क्या हुआ? सब हवा - हवाई हो गया। उनके नंबर दो ने ही कह दिया कि वो सब चुनावी जुमले थे। 
--- जुमलेबाजी में ये महाशय भी कोई पीछे नहीं रहे हैं भइया ! इन्होंने भी अस्थायी नौकरी को पक्की करने की बात कही थी...... कचरे के पहाड़ को हटाने की बात कही थी..... कच्ची बस्तियों को स्थाई करने की बात कही थी.... और तो और कोरोना के समय तथा दिल्ली में फैले दंगे के समय ये और इनकी सरकार जाने कहाँ लापता हो गए थे! 
मनुआ को इनकी बातों से ऊब होने लगी । उसने धीमे स्वर में हस्तक्षेप किया --- " ए भइया! आपलोगों की बातों से लग रहा है कि ई दोनों पार्टियां जनता के साथ एक ही तरह के खेल खेल रही हैं तो किसी तीसरे विकल्प पर विचार क्यों नहीं करते ? "
" तीसरा विकल्प....! अरे भाई, यहाँ कोई तीसरा विकल्प है ही नहीं। एक पुरानी पार्टी कांग्रेस है। किंतु, उसका तो यहाँ खेल ही खत्म हो गया है " -- अलाव को फूंक मारते हुए किसी ने कहा। 
" विकल्प होती नहीं है भइया, उसे तो जनता तैयार करती है। दिल्ली में इन दोनों के अलावे जो भी छोटी - बड़ी पार्टियां हैं, उन्हें समर्थन देकर एक विकल्प तो तैयार किया ही जा सकता है......वरना पिसते रहो इन इन दो पाटों के बीच में । " --- मनुआ ने कहा तो सभी लोग मनुआ की ओर ऐसे देखने लगे जैसे उसने कोई अजूबा बात कह दी हो। 

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