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मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

पूंजीवाद का आवधिक संकट 
हम सबने अपने जीवनकाल में 2008 के आर्थिक संकट को देखा है। लेकिन अगर आप इतिहास पर नज़र डालेंगे तो आप पाएँगे कि पूंजीवाद समय समय पर आर्थिक संकट से गुज़रते - उबरते रहता है। ये एक चक्र है। आइए इसको समझते हैं। पूंजीवाद में आर्थिक संकट तभी आता है जब बाज़ार में उत्पादित वस्तुओं की बिक्री कम हो जाती है। जैसा कि पिछले पोस्ट में आपको समझाया था कि पूँजीपति अपने मुनाफ़े को वापस उत्पादन में लगाता है और उसे विस्तारित पुनरुत्पादन कहते हैं। लेकिन विस्तारित पुनरुत्पादन को तभी आगे बढ़ाया जा सकता है जब पहले के उत्पादित सभी वस्तु बाज़ार में बिक जाएँ । बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्री कहते हैं कि वस्तु बाज़ार में बिना बिके रहेगी ही नहीं क्यूँ कि पूर्ति अपनी माँग खुद पैदा करेगी। 
अगर किसी वस्तु का उत्पादन पहले साल में 100 था और उसकी माँग भी 100 थी तो बाज़ार में बिना बिका हुआ कोई माल नहीं रहेगा। अगर दूसरे साल में उत्पादन 120 थी और माँग भी उतनी ही थी, तो भी बिना बिका माल कुछ नहीं बचेगा। हर साल अगर उत्पादन और माँग एक जैसे रहे तो बाज़ार में वस्तुओं का संचय नहीं होगा। 
लेकिन मार्क्स कहते हैं कि ऐसा नहीं होगा। अत्यधिक उत्पादन होना अवश्यम्भावी है। माँग में दो कारक हैं। एक है पूँजीपति के उत्पादन के साधन की माँग और दूसरी है मज़दूरों का सामान के खपत की माँग। मार्क्स कहते हैं कि जैसे जैसे उत्पादन में वृद्धि होगी ये दोनो कारक एक जैसे ही नहीं बढ़ेंगे । 
नीचे के चार्ट का अध्ययन करें। पाँचवे साल आते आते यद्यपि उत्पादन में 50% की वृद्धि होती है लेकिन मज़दूरों द्वारा खपत उसके अनुपात में नहीं बढ़ता। 5 करोड़ कम रहता है। लेकिन इस समय पूँजीपति 5 करोड़ के अधिक उत्पादन के साधन ख़रीद लेता है और बाज़ार में बिना बिके हुए वस्तु की संख्या शून्य हो जाती है तथा संकट टल जाता है। 
लेकिन संकट टालने का यह तरीक़ा भी ज़्यादा दिन चलेगा नहीं। क्यूँ कि इसी समय पूँजीपति को लगना शुरू हो जाता है कि मुनाफ़े की दर आगे कम हो जाएगी। इसी कारण अति उत्पादन को रोकने के लिए वह निवेश को कम करेगा। आँठवें साल आते आते उत्पादन तो बढ़ कर दुगुना हो गया, 200 करोड़ लेकिन निवेश 140 करोड़ के बजाए 130 करोड़ ही रहा। मज़दूरों द्वारा सामान की खपत पहले ही कम हो चुकी थी। 
परिणाम 10 करोड़ के सामान बाज़ार में बिना बिके रह जाते हैं। अब शुरू होता है आर्थिक मंदी का चक्र। चूँकि बाज़ार में सामान बिना बिके रह गए तो हर पूँजीपति अपने हानि को कम करने के लिए उत्पादन कम करेगा और मज़दूरों की छँटनी करेगा। बेरोज़गारी बढ़ेगी,मज़दूरों की आमदनी और कम होगी  और वस्तुओं की माँग और भी कम होते जाएगी। इसके कारण उत्पादन में और कमी होगी और ये कमी केवल उपभोग की वस्तुओं में ही नहीं होगी बल्कि उत्पादन के साधनों में भी होगी। पूँजीवादी अर्थव्यवस्था भयानक रूप से गिरती हुई माँग, रोज़गार और उत्पादन का एक spiral curve का रूप लेगी । 
बेरोज़गारी मज़दूरी को कम करेगी। माँग की कमी के कारण कच्चे माल की क़ीमतें घटेंगी। निवेश में कमी के कारण ब्याज दर कम होगा। इसके कारण आख़िरकार मुनाफ़े की अपेक्षाएँ बढ़ेंगी, और निवेश बढ़ने लगेगा। इसके कारण वापस रोज़गार और उत्पादन बढ़ेंगे। 
इस तरह पूँजीवादी अर्थव्यव्स्था एक Sine curve को फ़ॉलो करती है जहां आर्थिक संकट आएगा ही आएगा और वो अपने आप उस से निपटेगा। इस Sine curve को आप नीचे डाले हुए तस्वीर से समझ सकते हैं।

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