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मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

सबसे पहले हम यह समझने की कोशिश करते हैं कि इस पूँजीवादी व्यवस्था से पहले समाज में जो उत्पादन के तरीक़े थे उनमें शोषण कैसे होता था। उन समाजों में शोषण सीधा था और दिखता था। हम पहले सर्फ़ (कृषक दास) पर आधारित समाज का उदाहरण लेते हैं।
इस व्यवस्था में ज़मीन के मालिक कोई होता है लेकिन जोतते उसको सर्फ़ हैं।पूरी ज़मीन को दो भागों में बाँटा जाता है।एक हिस्सा मालिक का और दूसरा हिस्सा सर्फ़ का। अपने हिस्से के ज़मीन के उत्पाद को सर्फ़ रखता है जो उसके जीवन यापन के लिए होता है।लेकिन उसकी एक शर्त होती है।वो अपने हिस्से के ज़मीन पर 2 दिन काम करेगा और 4 दिन अपने मालिक के ज़मीन पर काम करेगा। रविवार का दिन छुट्टी का होता था। 
इन 6 कार्यकारी दिनों में 2 दिन सर्फ़ अपनी ज़मीन पर खुद के लिए काम करता है लेकिन वो अपने ज़मीन के हिस्से से उतना ही उत्पादन कर पाता है जिससे सिर्फ़ उसका किसी तरह जीवन यापन हो सके। ये दो दिन उसका आवश्यक श्रम समय (necessary labour time) है, जो उसके ज़िंदा रहने के लिए आवश्यक है। 
उन 6 दिनों में 4 दिन उसका अतिरिक्त श्रम समय (surplus labour time) है। इसी surplus labour time को ज़मींदार किराया के रूप में वसूल करता है। कोई भी ये देख सकता है कि किराया के रूप में दिया गया श्रम सर्फ़ का अतिरिक्त श्रम है। इस अतिरिक्त श्रम के बदले किराया के रूप में पैसे या उत्पाद भी दिया जा सकता है लेकिन किराया किसी भी रूप में हो वो सर्फ़ का अतिरिक्त श्रम ही है। 

अब दूसरा उदाहरण ग़ुलाम समाज का लेते हैं। गुलामों के मालिक कोई काम नहीं करते थे। सारा काम ग़ुलामों से कराया जाता था और उसके बदले उत्पाद का एक हिस्सा गुलामों को उनके जीवन यापन के लिए दिया जाता था। बाक़ी अतिरिक्त उत्पाद ग़ुलामों के मालिक का होता था। 

लेकिन पहले के प्रभावी वर्ग की तरह पूँजीपति वर्ग खुद को शोषक नहीं मानता। आश्चर्यजनक बात ये है की मज़दूर भी शोषण की अपरिहार्यता को नहीं समझते। उनकी कोशिश अपनी मज़दूरी बढ़ाने पर होती है ना कि इस शोषण की व्यवस्था को ख़त्म करने की। इसका कारण पूँजीवादी सिस्टम द्वारा खड़ा किया गया छलावा है कि पूँजीपति और मज़दूर क़ानून के सामने एक जैसे हैं; दोनो अपना माल बेचते हैं, मज़दूर अपने श्रम की ताक़त को बेचते हैं और पूँजीपति अपने उत्पाद को। 
मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र इस बाज़ार के मायाजाल के पर्दे को हटा देता है और ये साबित करता है कि पूँजीपति भी ज़मींदारों और ग़ुलामों के मालिकों की तरह ही बस एक शोषक हैं! 
क्रमशः 
#PoliticalEconomy

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