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मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

पूँजीपति के मुनाफ़े का सफ़र। भाग -२ 

इस से पहले कि मैं पिछले पोस्ट में पूछे गए सवाल का जवाब दूँ, मैं दास कैपिटल में लिखे गए पूँजीवादी अर्थव्यव्स्था की बुनियादी विशेषता को बताना चाहूँगा । 
पूँजीवादी उत्पादन हमेशा बाज़ार के लिए होता है। बाज़ार के लिए बनाया गया कोई भी सामान या सेवा वस्तु कहलाती है। रोज़ाना अरबों की संख्या में सामान ख़रीदे या बेचे जाते हैं। हम कैसे उन वस्तुओं का, जो कि एकदम अलग अलग पदार्थों के बने हैं या जिनकी उपयोगिता एक दूसरे से भिन्न है,आपस में तुलना कर सकते हैं जब तक उनमें कोई समान कारक नहीं हो। वो समान कारक क्या है? उनकी तुलना उनके कच्चे माल या उनकी उपयोगिता पर नहीं कर सकते। क्यूँ कि अलग अलग वस्तुओं में वो अलग अलग है। 
एक ही समान कारक है जो इन सब वस्तुओं में पाया जाता है और वो है इंसान का श्रम। जब कहते हैं कि एक चाकू और एक मीटर कपड़ा एक बराबर हैं तो हमारे कहने का मतलब ये होता है कि हालाँकि दोनो की उपयोगिता अलग है और दोनो अलग अलग पदार्थों से बनते हैं, एक चाकू और एक मीटर कपड़ा बनाने में एक बराबर इंसानी श्रम लगा है। और ये श्रम सिर्फ़ लोहार या बुनकर का नहीं है बल्कि दोनो के कच्चे माल और औज़ार में निहित श्रम भी शामिल है। 
लेकिन इसमें एक समस्या है। विभिन्न प्रकार के उत्पादक एक ही वस्तु का उत्पादन करने में अलग अलग मात्रा में श्रम का इस्तेमाल कर सकते हैं। ये अंतर तकनीक या मज़दूरों के स्किल पर निर्भर कर सकता है।इसी कारण किसी भी वस्तु की क़ीमत किसी एक के इंसानी श्रम पर निर्भर नहीं करती बल्कि वो निर्भर करती है सामान्य अवस्था में सामाजिक रूप से आवश्यक श्रम समय (socially necessary labour time). इसी को कहते हैं लेबर थियोरी ऑफ वैल्यू । 
अब आते हैं अपने सवाल पर। पूँजीपति ने मुनाफ़ा कब कमाया वस्तुओं की अदला बदली में या उत्पादन में। तो पहले अदला बदली की प्रक्रिया को समझते हैं। 
एक वस्तु की क़ीमत दूसरे वस्तु के रूप में अभिव्यक्त की जाती है। लेकिन कालांतर में व्यापार को आसान बनाने के लिए वस्तुओं की ख़रीद बिक्री के लिए बहुमूल्य रत्न या पैसों का उपयोग किया जाने लगा। वस्तुओं की क़ीमत (value) को जब पैसों में अभिव्यक्त किया जाने लगा तो उसे बिक्री मूल्य (price) कहा जाने लगा। अब प्राइस तो सप्लाई और डिमांड पर निर्भर करती है। किसी भी एक समय पर किसी वस्तु की प्राइस या तो उसके वैल्यू से कम होगी या ज़्यादा होगी। अगर प्राइस ज़्यादा है तो उस वस्तु का उत्पादन बढ़ जाएगा और बाज़ार में सप्लाई बढ़ जाएगी। इसके कारण प्राइस कम हो जाएगी। इसके उलट अगर प्राइस वैल्यू से कम है तो इसका उत्पादन और सप्लाई दोनो घट जाएँगे और इसके कारण प्राइस वापस बढ़ जाएगी। तो अगर लम्बे समय के अंतराल में अगर देखा जाए तो औसत  प्राइस हमेशा वैल्यू के बराबर रहेगी। 
दूसरे शब्दों में सामान्य अवस्था में ख़रीद बिक्री हमेशा बराबर वैल्यू में ही होगी। हाँ, एक पूँजीपति चाहे तो किसी दूसरे पूँजीपति को धोखा देने के लिए वस्तु की प्राइस उसके वैल्यू से अधिक रख सकता है। लेकिन उस अवस्था में पहले पूँजीपति का जो अत्यधिक मुनाफ़ा होगा वह दूसरे पूँजीपति का हानि होगा। पूँजीपति वर्ग कभी भी दूसरे पूँजीपति को धोखा देकर मुनाफ़ा नहीं कमा सकता। 
इस प्रकार हम देखते हैं कि पूँजीपति वर्ग कभी भी मुनाफ़ा वस्तुओं की ख़रीद बिक्री वाले प्रक्रिया में नहीं कमा सकता। यह मुनाफ़ा वह उत्पादन की प्रक्रिया में कमाता है। 
कैसे? वह अगले पोस्ट में 
क्रमशः 
#PoliticalEconomy

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