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मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

संचय और वृद्धि (Accumulation and growth)

दिहाड़ी मजदूरी या किसी भी प्रकार की मज़दूरी के अंतर्गत मुनाफ़े के उद्देश्य से वस्तुओं के उत्पादन की व्यवस्था को ही पूंजीवाद कहते हैं। मुनाफ़ा तभी मिलेगा जब बाज़ार में वस्तुओं को उनकी क़ीमत पर बेचा जाएगा। पूंजीवाद वह व्यवस्था है जहां बाज़ार में सफलता उत्पादकों के आपसी प्रतिद्वंद्विता से तय होता है। और ये इस पर निर्भर करेगा कि उत्पादन की क्षमता और निपुणता किसमें कितनी है। ज़्यादा क्षमता के लिए बेहतर तकनीक, बड़ा पैमाना और ज़्यादा निवेश चाहिए होता है। जो पूँजीपति ज़्यादा निवेश नहीं कर पाते और अपने उत्पादन को बढ़ा नहीं पाते वो दिवालिया हो जाते हैं। इसीलिए, बाज़ार की प्रतिद्वंद्विता हर पूँजीपति को शोषण को बढ़ाने और मुनाफ़े को वापस निवेश करने पर बाध्य करती है ताकि उत्पादन को बढ़ाया जा सके। ये पूँजीवादी व्यवस्था की सबसे विशेष बात है जिसका कोई उदाहरण इतिहास में नहीं मिलता। मुनाफ़े को वापस निवेश करने के प्रक्रिया को ही संचय कहते हैं। 
समाज लगातार उत्पादन के बिना जीवित नहीं रह सकता। जब पुनरुत्पादन एक ही पैमाने पर होते रहता है तो उसे सामान्य पुनरुत्पादन कहते हैं।उत्पादन में जो अतिरिक्त उत्पादित होता है वह समाज द्वारा पूरी तरह से खपत हो जाता है और इसी कारण अगले चक्र में भी उत्पादन का स्तर वही रहता है। पूँजीवादी व्यवस्था से पहले के समाज में कमोबेश यही होता था। और इसी कारण आर्थिक वृद्धि बहुत धीमी थी। 
इसके विपरीत बाज़ार की प्रतिद्वंद्वी ताक़तों ने पूँजीपतियों को बाध्य किया अतिरिक्त मूल्य का संचय कर उसको वापस उत्पादन में निवेश करने के लिए। लगातार किया गया संचय और निवेश उत्पादन के स्तर में लगातार वृद्धि करता रहेगा। मार्क्स ने इसे विस्तारित पुनरुत्पादन कहा। 
इस विस्तारित पुनरुत्पादन की सबसे ख़ास विशेषता यह है कि यह श्रमिकों को ग़रीबी की तरफ़ धकेलता जाता है। हर पूँजीपति के ऊपर बाज़ार का दबाव रहता है कि वो अधिक से अधिक मुनाफ़ा कमाए। इसके केवल दो ही तरीक़े हैं । पहला मज़दूरों के काम करने के समय को बढ़ाया जाए ताकि अतिरिक्त श्रम समय बढ़े ।इसी कारण नारायण मूर्ति से लेकर हर पूँजीपति आज भारत में काम करने के समय को बढ़ाने की वकालत कर रहा है। दूसरा तरीक़ा है उत्पादन को अधिक से अधिक मशीनों द्वारा किया जाए ताकि आवश्यक श्रम समय घटे।
 अगर श्रमिकों के काम करने के समय को बढ़ाया जाए, या कार्यभार को बढ़ाया जाए, या मज़दूरी कम की जाए तो ये मज़दूरों को पक्का गरीब बनाएगी। इसी कारण इस तरीक़े को निरपेक्ष अतिरिक्त मूल्य बढ़ाना कहते हैं। निरपेक्ष रूप से अतिरिक्त मूल्य को अगर बढ़ाया जाए तो मज़दूरों के जीवन स्तर में गिरावट आएगी और मज़दूर उसका पुरज़ोर विरोध करेंगे। इसी कारण पूँजीपति मशीनों का उपयोग अधिक से अधिक करते हैं उत्पादन के लिए।इसे सापेक्ष अतिरिक्त मूल्य बढ़ाना कहते हैं। लेकिन मशीनों के अत्यधिक उपयोग से श्रमिकों द्वारा जो उत्पाद में मूल्य जोड़ा जाता है वो घटने लगता है। तो पूँजीवादी व्यवस्था में मज़दूरों की ग़रीबी या निरपेक्ष हो या सापेक्ष, बढ़ेगी ही। 
अत्याधुनिक यंत्रीकरण छोटे उत्पादकों और फ़र्म को दिवालिया कर देगी। इसके कारण बेरोज़गारी बढ़ेगी। पूंजीवाद बिना बेरोज़गारी के रह ही नहीं सकता। अगर सभी लोग रोज़गार वाले हो जाएँगे तो मज़दूरी श्रम शक्ति के मूल्य से बढ़ने लगेगी और पूँजीपति का मुनाफ़ा कम होने लगेगा । मार्क्स ने बेरोज़गारों को औद्योगिक रिज़र्व सेना का नाम दिया था। इन्हें जब भी ज़रूरत होगी काम पर बुला लिया जाएगा । 
#PoliticalEconomy

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