मनुआ - 67
पांडे ने मनुआ को देखते ही चहकते हुए कहा -- " का रे मनुआ ! देखा, मोदीजी ने बंगालो दखल कर लिया। एक समय का लाल दुर्ग आज गेरुआ दुर्ग बन गया रे ! "
" लाल से गेरुआ नहीं हुआ है, भइया! सबुज से गेरुआ हुआ है। लाल जब तक था , तब तक एगो सीट के लिए ई लोग तरसते थे। "
" ऊ तो ठीक है। लेकिन तुमलोग तो केरलम भी हार गया। माने पूरे देश से साफे न हो गया ! "
" हम साफ होने वाले नहीं हैं, भइया ! हम तो तब तक रहेंगे जब तक ई धरती पर अन्याय, अत्याचार और शोषण का समराज रहेगा। देख रहे हैं न... पानेसर, गुड़गांव से लेकर नोएडा तक मजदूरों के शोषण के खिलाफ कौन सड़क पर लड़ रहा है...! "
" अरे, ऊ सब से कुछ होने वाला है। मोदीजी के सामने सब टांय टांय फिस्स हो जाएगा। " ---पांडे ने गर्व से हंसते हुए कहा।
" एतना घमंड भी ठीक नहीं है, भइया ! एक बार शोषित - पीड़ित जनता जब जाग जाती है, तब बड़ा से बड़ा सामराज भी ढह जाता है। "
" दूर बुड़बक ! तुम लोग अभियो समाजेवाद का सपना देख रहा है जबकि पूरी दुनिया से तुम्हारा सफाया हो गया ....। "
" सफाया हो गया तो ई भाजपाई लोग बंगाल में जीतने के बाद सबसे पहिले लेनिन के मूरती काहे तोड़ा , भइया ?.....काहे कि ऊ जानते हैं कि उनकर राह के सबसे बड़ा रोड़ा ई हे विचार है। लेकिन, उनको भरम था कि बंगाल के लोग सब के सब गेरुआ रंग में रंगा गया है। दूसरे दिन लाल झंडा लिये हुए लोग निकल पड़े और फिर से ऊ मूरति लगाया जा रहा है। "
" अरे, ऊ तो ठीके न हुआ था। तुमलोग सब दिन विदेशियों के गुलामे रहोगे? अच्छा ई बताओ कि लेनिन की मूरति का हमरे देश में का काम ? "
" ई सवाल आप इसलिए पूछ रहे हैं, भइया, क्योंकि आप लेनिन के बारे में कुछ नहीं जानते हैं। लेनिन न केवल अपने देश में बल्कि पूरी दुनिया में मनुष्य द्वारा मनुष्य के और देश द्वारा किसी दूसरे देश के शोषण के खिलाफ थे। रूस की क्रांति से प्रेरणा पाकर उस वक्त पूरी दुनिया के जनगण में सामराजवाद से मुक्ति की इच्छा जाग उठी थी। एशिया, अफ्रीका के सभी देशों में मुक्ति संघर्ष छिड़ गया था और लेनिन ने उन सभी संघर्षों का समर्थन किया था। हमारी आजादी की लड़ाई का भी कई लेख लिखकर और सार्वजनिक वक्तव्य देकर उन्होंने समर्थन किया था। मार्क्स, लेनिन, गांधी जैसे मनीषियों के विचार किसी देश की सीमा तक सीमित नहीं रहते, भइया! वो पूरी दुनिया में फैल जाते हैं। तभी तो हमारे गांधीजी की मूरतियां भी दुनिया के कई देशों में.... । "
" बाप रे! लेनिन के एगो मूरति टूटे पर एतना लंबा भाषण तू देगा, मैं नहीं जानता था। हम तो सुने हैं कि उनके अपने देश में भी उनकी मूरतियां तोड़ी गई थीं। "
" तोड़ी गई होंगी.... मूरख और विचार से दिवालिया लोग कहाँ नहीं होते! अफगानिस्तान के वामियान घाटी में इस्लामिक कट्टरपंथियों ने बुद्ध की सदियों पुरानी मूरति तोड़ी थी तो क्या उन्होंने बुद्ध के विचारों को दुनिया से मिटा दिया, नहीं न ? भइया ! महापुरुषों की मूरतियां उनके विचारों का प्रतीक होती हैं, मूरतियों को आप भले तोड़ कर मिटा सकते हैं, पर उनके विचारों को नहीं मिटा सकते ...।"
" अच्छा -- अच्छा, अब अपना भाषण बंद करो। हम तो बस इतना जानते हैं कि मोदी है तो मुमकिन है। अब भारत को हिन्दू राष्ट्र बनने से कोई नहीं रोक सकता है। " -- कहते हुए पांडे चला गया। मनुआ उसे जाते हुए देखता रहा। फिर मन ही मन कहा -- " मार्क्स बाबा ने यूं ही नहीं धरम को अफीम कहा था। "
--- कुमार सत्येन्द्र
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