आज कई दिनों के बाद मनुआ दिखा ।वह किसी से बतिया रहा था । चेहरे पर थकान के चिह्न स्पष्ट थे। मुझे देखा तो चहकते हुए बोला -"आइए बाबूजी , कैसे हैं आप ?"
"मैं तो ठीक हूँ , तुम कहाँ गुम हो गए. थे ?"
" नोट की लाइन मे था बाबूजी । आठ ही तारीख को हमें वेतन मिला था और समझिए कि सिर मुंड़ाते ही ओले पड़े । चार दिनों के मशक्कत के बाद नोट बदल पाया ।"
" सारे बदल लिये न ?"
" हम ठेका वर्कर को मिलता ही कितना है ! अच्छा बाबूजी, लइनवा मे लगे -लगे सुनता रहा कि काला धन पर अच्छा असर पड़ा है ...कि ये देशहित मे है ....थोड़ा कष्ट भले ही हुआ ,किन्तु आगे अब कोई काला धन .......।"
" कहा तो यही जा रहा है भाई , पर देश के कई अर्थशास्त्री इससे इत्तिफाक नहीं रखते हैं ।"
" हाँ बाबूजी, यह तो टीविया पर बहसवा मे देखबे किये । उ का नाम है ..आपके नेता जी , सीताराम येचुरी बहुत ही साफ साफ कह रहे थे ....।"
" ....वे तो अंग्रेजी मे बोल रहे थे , तुम कैसे समझे ?"
" बाबूजी , मैं भी तो मैट्रिक पास.हूँ । थोड़ा थोड़ा समझता हूँ ...और ऊ कबो कबो हिन्दिओ तो बोल रहे थे । एक बार जेटली जी उनको टोक दीहिन ...का तो एन पी ए आउर लोन माफी का बात रहा । बड़े बड़े लोगन के लोन सरकार माफ कर देती है शायद । लेकिन जेटली जी बोले कि .....।"
" हाँ , उनका कहना था कि सरकार माफ नहीं करती है , बल्कि इन कर्जों को , जो बहुत दिनों से चुकती न हो रहे हैं , उन्हें बैलेंस शीट से हटाकर अलग खाते मे डाल देती है , जिन्हें बाद मे कभी वसूला जायेगा । हलांकि वैसे लोन कभी वसूल नहीं होते और चूंकि बैंक के बैलेंस शीट से वो हट जाते हैं , बैंक वाले भी उन्हें भूल जाते हैं । उनकी वसूली जबर्दस्ती नहीं की जाती । समझो कि माफ ही हो जाते हैं ।"
" बाबूजी ,.यह तो बेईमानी है । जब किसानों से कर्ज वसूलने के लिए कुर्की - जब्ती होती है तो इन धनसेठों से क्यों नहीं ? या फिर किसानों के कर्ज भी वइसहीं हटा कर , उ का.कहते हैं , राइट औफ करो ।"
" ऐसा न होगा भाई , क्यों कि चुनाव मे तुम केवल वोट देते हो और वो लोग वोट और नोट दोनों देते हैं ।"
" एकर मतलब कि ई सब के जड़ मे चुनावी चंदा है । एही पर रोक लगनी चाहिए । "
" सही समझे तुम । राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले चंदे मे पूरी पारदर्शिता की जरूरत है ।"
" मुझे लगता है बाबूजी कि भ्रष्टाचार आउर काला धन भी तभिए खतम होगा ।"
" शायद .....! चलो , कई दिनों से हम युनियन औफिस नहीं गये हैं ।"
## पहचान की राजनीति बनाम वर्गाधारित राजनीति। ## पहचान की राजनीति का मतलब क्या है ? उत्तर आधुनिकता की ही तरह पूंजीवादी सिद्धांतों से निकली पहचान की राजनीति मार्क्सवाद का विकल्प होने का दावा करती है। यह मानती है कि राजनीति और भौतिक परिस्थितियों के बीच कोई रिश्ता नहीं होता। यह एक ऐसे समाज की परिकल्पना करती है जो तमाम तरह के शोषण और आपसी शत्रुता पर टिका है। इसमें यह सोच निहित है कि जातीयता, धर्म, नस्ल या लैंगिकता आदि से जुड़े शोषण व आपसी शत्रुता का भौतिक परिस्थितियों से कोई रिश्ता नहीं होता। यह पूरी तरह से व्यक्तिगत तौर पर महसूस किया जाता है। पहचान एक व्यक्ति द्वारा उसके उत्पीड़न के अनुभव के आधार पर बनती है और पूरी तरह से आत्मपरक और स्वायत्त होती है। यह किसी भी समाज के वर्ग विभाजन पर आधारित विश्लेषण को अस्वीकार करता है। पहचान की राजनीति के अनुसार समाज में मुख्य विभाजन है -- व्यक्तिगत रूप से उत्पीड़न सहन करने वालों और बाकि सभी उनलोगों के बीच जिन्होंने उत्पीड़न का अनुभव नहीं किया है। उदाहरण के लिए पहचान की राजनीति के सिद्धांतों के अनुसार जातिगत उत्पीड़न का अनुभव करने वाला एक दलित मजदूर...
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