मै मनुआ के घर पहुंचा तो देखा कि वह मायूस बैठा हुआ है । पूछने पर खौलते ' अदहन ' की तरह उबल पड़ा ।
" ई मीडियवा को क्या हुआ है बाबूजी ! ...इतना बड़ा मजदूरों का तीन दिनों का महापड़ाव .....लाखों मजदूरों का परदर्शन और मीडिया में सन्नाटा .....? "
" मीडिया बिक चूकी है भाई , कॉरपोरेट कंपनियों ने खरीद लिया है ...कुछेक को छोड़ दो तो पूरी मीडिया चारण की भूमिका में है ...उनके लिए न मजदूर मायने रखता है और न ही किसान ....। "
" पर हम तो अपने हीं घर में झूठा बन रहे हैं न , उका कल जब दिल्ली से लौटे तो पत्नी कहने लगी ....झूठो दिल्ली गए थे ....कहीं कुछ तो न हुआ ...धरना - परदर्शन के बहाने घूमने जाते हैं .....उ कुल होता तो टीविया पर न दिखाता .....। ईहे बात पांडे भइया बोल दीहिन । सुनके एतना गुस्सा आया कि मन किया कि ऊ डब्बवा के पटक के फोड़ दें ....।"
" इसीलिए कहा था कि मोबाईल में फोटो खींच लो ....।"
" ऊ तो खींचबे किये थे ...वोही देखा के न मुँह बंद किये ...बाकि ओकरा से ई कहाँ पता चलता है कि केतना लोग जुटिन थे और कौन का बोलिन थे .....।"
अचानक पांडे को आते देखकर मनुआ चुप हो गया । पांडे का चेहरा लटका हुआ था । मनुआ ने पूछ दिया - " का हो पांडे भइया , हमरा पड़ाव फेल हो गया , तबो आप खुश नहीं दिख रहे ...कल तो पूरा चहक रहे थे .. ! "
" तुमको तो हर घड़ी चुहले सूझता है ...कभी गंभीर भी रहा करो " - पांडे के स्वर में उदासी थी , " ऊ का है कि छोटकी बिटिया की शादी जो हमने तय की थी ....सो ....।"
" टूट गई का ...? "
" अरे नाहीं ...ऊ दहेज वाला मामला है ...अब मांग और बढ़ गया है ...। "
" आँय भइया ! सदिया अपने जात - धरम में तय किये ...। "
" का बकवास है....दूसर जात में ! बेटी को गरदन अईंठ के कुआँ में न डाल देंगे ....।"
" फिर काहे रो रहे हैं ? रात - दिन जात - धरम को लेकर लेकर लड़ते फिरते हैं पर , समय आया तो सब हवा हो गया न , अब काहे मुँह लटकवले घूम रहे हैं ...जात के पिकनिक में , जात के सम्मेलन में तो तन मन धन तीनो झोंक देते हैं ...अब ऊहे अप्पन जात वाला जोंक अईसन लगा न चूसने ...! "
" देख मनुआ , राजनीति मत बतियाव ...जात - धरम की एकता एक बात है और बियाह - शादी अलग बात...दूनों के मिलाओ मत , समझे । "
" कुछो अलग न है..ईहे कुल राजनीति है । अप्पन जाति के तनिका हमसे अमीर अप्पन बेटा - बेटी का बियाह हमरे घर में करेगा का ? ...नहीं । ...काहे कि हम , ऊ का कहते हैं , ओकर स्टेटस के न हैं...ऊ क्लर्क है और हम चपरासी हैं , ऊ सुपरवाइजर तो हम मजदूर हैं , ऊ परमामेंट तो हम ठेका मजदूर हैं ...ई बात है कि नहीं ? "
" ई बात तो है भाई ...बाकि पइसा से ऊहो खरिदा जाता है ....।""
" पइसा....! ठीक बोले भइया ...और वो ही खातिर हम लड़तेहैं कि हमरो कम से कम 18000/- रु. प्रति माह वेतन मिलना चाहिए । "
" ई पर कहाँ मतभेद है .... हम्मर यूनियन भी तो यही मांग कर रही है ....। ""
" आपका यूनियन ...! हा...हा....हा....वो किससे मांग रही है......सरकार तो उन्हीं की है , फिर मांग किससे रही है ...? ""
" फिर तुम राजनीति बतियाने लगा...हम तो आए थे दुःख - दरद बांटने..बाकि तू....। " --कहते हुए पांडे जी उठे और चल दिये । मनुआ मेरी ओर देखकर मुस्कुरा दिया ।
मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र! सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं। इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...
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