Skip to main content

मनुआ - 36

मैं मनुआ के साथ बजट के बारे में चर्चा हीं कर रहा था कि पांडे आ धमका ।
" का सर जी , बजटवा पर चर्चा कर रहे हैं का ?सचमुच कमाल कर दीहिन मोदीजी । ईहे कहाता है जनता जनार्दन का बजट । ऐ मनुआ , अब काहे मुँह लटकवले है ।स्वास्थ बीमा के खूब लाभ उठाओ न । .....किसानों सब के दिल खोल के दाम दे दीहिन ....लागत के डेढ़ गुणा दाम.... और का चाहिए ? "
" ए पांडे भइया , जलल पर नीमक मत छिड़किये ! ...स्वास्थ बीमा ! ईहो तो बता दीजिए कि एकरा खातिर पइसा केतना दीहिन है ? ....दू हजार करोड़ ! ऊँट के मुँह में जीरा के फोरन ! ऊपर से कई एक ठो पेंच । पांडे भइया ! ई कुल कागजी दिखावा है , गरीबों के आँख में धूल झोंकिन है .....अगले साल चुनाव जो है । "
" ई देखो ...नेकी का जमाना हीं नही रहा । अब और का करते , बोलो , ...डीजल - पेट्रोल पर एक्साइज घटयबे किहिन ...गरीब औरत सब के मुफते में गैस चूल्हा देइए रहे हैं ...दू हजार बाइस तक सब गरीब लोगन को घर देइए  रहिन है ...और का करते भाई ...? "
" ई भी बता दो न भइया कि ई कुल जुमला है । "
" जुमला ! सो कैसे ? "
" सो ऐसे कि चुनाव से पहिले 2014 में का बोलिन थे ...हरेक साल दू करोड़ नौजवान को रोजगार देंगे..4 साल होने को है , बताओ न , कितनों को रोजगार दीहिन ? ...और अब बोल रहिन है कि चाट - पकौड़ा बेचना भी तो रोजगारे है । "
" हँ ...तो हइए है ....कल्हे अध्यक्ष जी बोलिन है कि कोई काम छोटा नहीं होता ....।। "
" अच्छा ! तो आप कहिया से जूता पॉलिश करने जा रहे हैं भइया ? "
" का बोला ? देख मनुआ , जरा हदे में रहा कर , समझे । "
" का हुआ भइया ? अरे अप्पन फैक्टरिया बिका जाएगा ,  तो  का पता नया मालिक रखेगा कि निकाल देगा । ...नहीं मालूम है का .... ईहे बजटवा में ईहो पास हो रहा है कि 60 या 80 हजार करोड़ रुपैया पब्लिक सेक्टर के कल करखाना बेंच के जुटाया जाएगा । "
" दूर भकचोन्हर ! अरे मालिक बदलिओ जाएगा तो हमसब पर का फरक पड़ेगा ....ऊ का बिना मजूरे के फैक्टरी चला लेगा ? "
" न ..न ...मजूर रहेगा काहे नहीं । नया मालिक - नया मशीन - नया मजूर ...ई भी तो हो सकता है । "
" का होगा ...न होगा , पहिले हीं से प्राण काहे छोड़ दें । कहउतिया वाली बात ...कि लौर कपारे भेंट न , बाप बाप चिचिआए । "
" का भइया , रोजे तो लौर खा रहे हैं , फिर भी शौके लगल है का ? महँगाई का लौर , बेरोजगारी का लौर , प्राइवेट शिक्षा का लौर , प्राइवेट हस्पताल का लौर और न जाने कौन कौन सा लौर ....। "
" ई कौनो नया बात नहीं है मनुआ , ई होते रहा है और होते रहेगा ...एकर पहिले जो सरकार थी , ऊहो तो यही कर रही थी ...। " --- कहते हुए पांडे उठा और चलते बना । मनुआ मेरी ओर देखकर मुस्कुरा दिया ।

Comments

Popular posts from this blog

मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र!  सवाल ये उठता है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र ही क्यूँ? जवाब है कि मार्क्सवादी राजनैतिक अर्थशास्त्र हमें पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण, विकास और उसके संकट को समझने में मदद करता है। यह समाज के आर्थिक आधार का अध्ययन करता है और इसीलिए उनके लिए ज़रूरी है जो सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष करते हैं। बुर्ज़ुआ अर्थशास्त्र, जो कि हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है, की तरह मार्क्सवादी अर्थशास्त्र ये दिखावा नहीं करता कि वह सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की विश्वव्यापी आर्थिक नियमों   की खोज करने की कोशिश करता है। मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार हर उत्पादन के तरीक़े का अपना विशिष्ट नियम होता है। इसी कारण मार्क्सवादी विश्लेषण के इस विज्ञान को हम राजनैतिक अर्थशास्त्र कहते हैं।  इस विषय पर मार्क्स से लेकर लेनिन ने बहुत कुछ लिखा है परंतु हम आसान तरीक़े से राजनैतिक अर्थशास्त्र के निम्नलिखित चार सवालों तक ही खुद को सीमित रखेंगे - 1. पूंजीवादी अर्थव्यव्स्था वह उत्पादन का तरीक़ा है जहां पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों के मालिक होते हैं वो उत्पादन के लिए म...

हो वर्ष नव

हो वर्ष नव हो हर्ष नव हो ‌‌सृजन नवल हो गीत नया  नव ताल - सुर संगीत नया  नूतन जीवन  हो रंग नया  नव नव विहंग नव नव कलरव नव पुष्प खिलें नव नव पल्लव  हो वर्ष नव हो हर्ष नव हालात नए ललकार नई कर ले स्वीकार  मत मान हार  उम्मीद नई  संकल्प नया  प्रज्ज्वलित कर एक दीप नया  हो तम  विनाश हो तम विनाश हो वर्ष नव हो हर्ष नव --- कुमार सत्येन्द्र

मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र

पूँजीपति के मुनाफ़े का सफ़र. अंतिम भाग  हमने ये तो स्थापित कर लिया कि पूँजीपति अपना मुनाफ़ा ना तो कच्चे माल और ना ही उत्पादित वस्तुओं के ख़रीद बिक्री में कमाता है। वह मुनाफ़ा कमाता है उत्पादन के दौरान। लेकिन कैसे? इसको समझने से पहले मैं आपको वापस मार्क्स के दास कैपिटल से एक और शब्द को समझाता हूँ। वह शब्द है “श्रम शक्ति” या “labour power”.  पूँजीपति मज़दूरों से उनके श्रम शक्ति को ख़रीदता है और बदले में उनको मज़दूरी देता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि मज़दूरी = श्रम शक्ति।  आपने कभी ये सोचा है कि किस प्रक्रिया से मज़दूरों की न्यूनतम मजदूरी तय होती है। इसे तय करने वाली कमिटी एक लम्बे प्रक्रिया के बाद यह कैल्क्युलेट करती है कि मज़दूर को महज़ अपनी ज़िंदगी जीने के लिए कितना मज़दूरी दी जाए। ये कोई नई बात नहीं है। इतिहास में भी सर्फ़ और ग़ुलामों को उत्पाद का उतना ही हिस्सा दिया जाता था जिस से वो महज़ ज़िंदा रहें। उनका हिस्सा परम्परागत तरीक़े से तय किया जाता था जब कि आज के आधुनिक युग में मजदूरों की मज़दूरी श्रम के डिमांड और सप्लाई पर निर्भर करती है। हालाँकि मज़दूर एक साथ आकर अपनी...