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बेटी

बेटी
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बेटी जब बड़ी होती है
छोटी हो जाती है
 उसकी दुनिया
बड़े हो जाते हैं 
वर्जनाओं के घेरे

बेटी जब बड़ी होती है
छोटा हो जाता है
माँ का आँचल 
झुक जाती है 
पिता की कमर
कमजोर हो जाते हैं
उनके कंधे

बेटी जब बड़ी होती है
छिन जाती है मुस्कान
लगती है हँसने पर पाबंदी
छिन जाती है 
उसकी चपलता

बेटी जब बड़ी होती है
डरने लगती है
हवा,पानी,आग से
डरने लगती है
अपनी ही परछाई से

और जिस देश में 
इस तरह डरी होती हैं बेटियाँ
वहाँ लेता है जन्म
एक अधमरा नागरिक
एक भीरु समाज ।

------ कुमार सत्येन्द्र

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