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मनुआ - 70

मनुआ - 70

पेट्रोल - डीजल की कीमत में लगातार हो रही बढोत्तरी के खिलाफ बिरसा चौक पर प्रदर्शन एवं सभा करके हम लौटे ही थे कि पांडे आ धमका। उसने आते ही मनुआ से पूछा -- " अरे मनुआ  ! ई काक्रोच जनता पार्टी का बला है  ? सुन रहे हैं कि सोशलमीडिया में धमाल मचवले है❓ "
" ए भइया! बहुत जादे तो हम भी एकरा बारे में न जानते हैं। इतना सुने है कि चारे दिन में लाखों लड़िकन सब इसका मेंबर बन गए हैं। अच्छा हुआ भइया कि तुमने ई सवाल उठा दिया। बाबूजी ही एकरा बारे में डिटेल से बतायेंगे। " 
मनुआ ने मेरी ओर इशारा कर कहा। दोनों की निगाह मुझ पर टिक गईं। 
 " अरे, इसकी शुरुआत पिछले दिनों एक मुकदमे के दौरान सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की एक वाहियात टिप्पणी से हुई है । उन्होंने देश के बेरोजगार नौजवानों की तुलना कॉक्रोच से कर दी। तुम्हें तो मालूम है कि हमारे देश में बेरोजगारी अब तक के उच्चतम स्तर पर हैं। नौजवानों में घोर निराशा व्याप्त है। कोढ़ में खाज यह कि आए दिन नौकरी के लिए हो रही परीक्षाएँ  परचा लीक हो जाने के कारण रद्द हो जा रही हैं। अभी कुछ दिन पहले मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए हुई परीक्षा भी रद्द हो गई। उससे 22 लाख छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया। अब सरकार की नाकामियों का ठीकरा जब नौजवानों पर फोड़ा जाएगा तो उनमें आक्रोश तो होगा ही न ? न्यायाधीश महोदय की टिप्पणी ने आग में घी का काम किया । सोशलमीडिया में नौजवानों ने जमकर उनके विरोध में व्यंग्यात्मक मीम बनाये । "
" अच्छा तो ई कॉक्रोच जनता पार्टी उन्हीं लड़कों ने बनाया है। " -- पांडे ने ऐसे कहा जैसे उसे जवाब मिल गया। 
" नहीं, इस परिघटना का सूत्रधार अमेरिका के बोस्टन शहर में  है....। "
" हुं, अब समझा  .... विदेशी हाथ  ! तभी कहूँ कि हमरी सरकार इतना चिंतित काहे है...! " -- पांडे ने बीच में ही टोक दिया। मनुआ को उसका टोका - टोकी अच्छा न लगा। उसने रूखे स्वर में कहा -- " हद करते हो पांडे भइया  ! बाबूजी की बात अभी पूरी भी नहीं हुई कि तुम बीच में कुद पड़े। ..... अमेरिका में कौन है बाबूजी  ? "
" एक भारतीय छात्र जो बोस्टन शहर में पढ़ाई कर रहा है और इंटरनेट का विशेषज्ञ है। उसका नाम अभिजित दीपके है। जब उसने एक्स पर काक्रोच को लेकर हुए बवाल को देखा तो अपने हैंडल से कटाक्ष के रूप में एक आह्वान किया कि क्यों न सभी काक्रोच एकजुट हो जायें!  और, उसने एकजुटता के लिए एक ऑनलाइन प्रपत्र जारी कर दिया। "
" फिर .....? "
" फिर क्या, कुछ ही मिनटों में उसने देखा कि लगभग पांच हजार फॉर्म भरे जा चुके हैं और उसने नोटिस किया कि लगभग सभी लड़कों की उम्र 18 से 30 वर्ष के बीच की है यानि कि जेन - जी। इसके बाद उसने कॉक्रोच जनता पार्टी के नाम से एक वेबसाइट बनाकर उस पर अपनी मांगें डाल दी। साथ ही, उसने फेसबुक, एक्स और इंस्टाग्राम पर कॉक्रोच जनता पार्टी के एकाउंट खोल दिये। और, उसके बाद वह हुआ, जो आज तक कभी न हुआ था। चार - पांच दिनों में ही उसके इंस्टाग्राम पर दो - ढाई करोड़ से भी अधिक फॉलोवर्स हो गए। "
" ऊ लोग चाहते क्या हैं  ? कहीं ई देश के खिलाफ कोई साजिश  तो नहीं है  ? " ---- पांडे ने शंका जाहिर की। 
" मुझे तो ऐसा नहीं लगता है  । यह निराश और हताश युवा पीढ़ी की प्रतिक्रिया है जो अब सोशलमीडिया में आंदोलन का रूप ले लिया है। पार्टी के संस्थापक ने सोशलमीडिया एकाउंट्स में पांच ऐसी मांगें डाल दी, जिसे लोगों ने बहुत  पसंद किया। "
" अरे मनुआ, ई सब सरकारे के खिलाफ हो रहा है और कुछ नहीं। लेकिन, ई लोग को नहीं मालूम है कि मोदी जी को हिलाना आसान नहीं है। अच्छा भाई, मैं चलता हूँ, आरती का टाइम हो गया है। " --- कहते हुए पांडे चला गया। 
परन्तु, मनुआ की जिज्ञासा और बढ़ गई थी। उसने नौजवानों द्वारा खुद को कॉक्रोच स्वीकार कर लेने पर आपत्ति जाहिर करते हुए पूछा -- " तो क्या आप उस कॉक्रोच जनता पार्टी के साथ हैं, बाबूजी? 
"
" देखो मनुआ, जब सिस्टम का संकट इतना गहरा है, जब सब कुछ इतना टेढ़ा है तो जवाब सीधा कैसे हो सकता है  ! हम उस दर्द के साथ हैं, जिसने वह पार्टी बनाई। हम उस गुस्से के साथ हैं, जिसने यह नाम चुना और हम उस सिस्टम के खिलाफ हैं, जिसने वह जमीन तैयार की। सोचों  कि जब एक पढा - लिखा  नौजवान खुद को कॉक्रोच कहने पर गर्व करने लगे तो यह उसकी कमजोरी नहीं है बल्कि पूंजीवाद की सफलता है। मार्क्स ने इसे कहा था -- विरक्ति। जब इंसान अपनी मिहनत से, अपने काम से, अपने आप से बेगाना हो जाता है तो एक ऐसी जमीन तैयार हो जाती है, जिसपर काक्रोच जनता पार्टी जैसे नाम उगते हैं। "
" तो क्या इस तरह नेट पर मीम बनाना और काले कपड़े पहनकर अपनी पहचान बनाना ही इस विरक्ति का इलाज है , बाबूजी  ? "
" नहीं, यह इसका इलाज नहीं है। "
" तो फिर इलाज कहाँ है, बाबूजी  ? "
" इलाज उस मजदूर के पास है जिसने विरक्ति का नाम नहीं पढ़ा, पर उसे जीया जरूर है। मां - बाप, दादा - दादी, नाना - नानी, पीढ़ियों से जीते हुए उसके रगों में यह बहता है। वह मजदूर जिसके भीतर इस सिस्टम के लिए हजार साल पुराना गुस्सा और हजार साल पुरानी नफरत है। जेन जी का गुस्सा असली है, क्योंकि पूंजीवाद का संकट असली है। बेरोजगारी, खोखले डिग्री , गिग इकोनॉमी का जाल सब असली है, पर इस गुस्से को किसी पार्टी के इंस्टाग्राम के पेज की बजाय मेहनतकश के संघर्ष के साथ जोड़ना होगा। मध्यमवर्गीय कॉक्रोच की विरक्ति तब खत्म होगी जब वो गंदे नाले में मरने वाले के साथ खड़ा होगा, जब वो फैक्ट्री गेट पर धरने में शामिल होगा, जब वो समझेगा कि उसका दुश्मन वो काक्रोच नहीं जो नीचे है, उसका दुश्मन वो है जो ऊपर बैठकर दोनों को कॉक्रोच कहता है। "
" ठीक कहा, बाबूजी, आपने। जो दुनिया चलाते हैं, वही दुनिया बदलेंगे....! "
" पर, बदलेंगे, साथ मिलकर, संगठित होकर  । कॉक्रोच की तरह नहीं, इंसान की तरह। "
" बाबूजी, यही ध्रुव सत्य है। बाबासाहेब ने भी कहा है -- शिक्षित बनो , संगठित रहो और संघर्ष करो। " 
        मनुआ का चेहरा खुशी से खिल उठा। 

 ( सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन द्वारा जारी एक विडियो से प्रभावित होकर)

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