मनुआ - 71
मनुआ घर से निकला ही था कि मंडल दा से मुलाकात हो गई। मंडल दा यानी अचिंत्य मंडल। मनुआ के पड़ोस में किराये के मकान में रहते हैं और बोकारो स्टील संयंत्र में किसी प्राइवेट कंपनी के मुलाजिम हैं । करीब एक हफ्ते की छुट्टी के बाद आज ही सुबह वे चास लौटे हैं। प्रणाम - पांति के बाद मनुआ ने मंडल दा से बंगाल में नई सरकार के गठन के बाद के माहौल के बारे में जानने की गरज से पूछा -- " बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद लोग खुश तो हैं, मंडल दा ? "
प्रश्न सुनकर पहले तो वे गंभीर हो गए। फिर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा -- " अभी तो नई सरकार बनी ही है, मनुआ ! वह क्या करेगी, भविष्य के गर्भ में है। लेकिन, सरकार के समर्थक अति उत्साह में हैं । उनकी गतिविधियों से आम लोगों को यह महसूस हो रहा है कि वे आसमान से टपके और बबूल में अटके हैं। "
" ऐसा क्यों दा ? अभी तो सरकार को बने जुम्मा - जुम्मा आठ दिन भी नहीं हुए हैं ! "
" लगता है कि तुम बंगाल के न्यूज़ नहीं देखते हो ? देखोगे भी कैसे , टेलीविजन के हिंदी चैनल हों या सोशल मीडिया के चैनल, वे तो तृणमूल कांग्रेस के अंदर हो रहे टूट - फूट को ही दिखाने में व्यस्त हैं। जबकि, वहाँ चारो ओर अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गई है । "
" अच्छा ! ऐसा क्या हो रहा है, दादा ? "
" देखो, बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद सत्ता समर्थकों द्वारा अपने विरोधियों पर जो आक्रमण होते हैं, वह तो जग जाहिर है । इस बार केंद्र सरकार ने भी एक अभियान छेड़ दिया है। "
" केंद्र सरकार ? वह क्या मंडल दा ? "
" हावड़ा - सियालदह सहित सभी रेलवे स्टेशनों को हॉकर मुक्त करने का अभियान। गरीब हॉकरों को अपने सामान हटाने का भी समय नहीं दिया गया। सीधे बुलडोजर लगाकर सब गुमटा - गुमटी और रेड़ी - ठेला तोड़ दिया गया। गरीब हॉकरों के सामने रोजी - रोटी का सवाल खड़ा हो गया है। "
" अच्छा, यह तो घोर अमानवीय काम है, दादा ! ... इसका तो विरोध होना चाहिए। क्या कोई राजनीतिक दल या संगठन इसका विरोध नहीं कर रहे हैं..? "
" ऐसा नहीं है। तुम तो जानते हो, बंगाल प्रतिरोध की धरती है। लाल झंडा वालों ने संगठित हो कर प्रतिरोध करना शुरू कर दिया है। कई स्टेशनों पर वे लोग बुलडोजरी कार्रवाई रोकने में कामयाब हुए हैं। सुना है कि सीपीएम के राज्य सचिव ने रेलमंत्री को पत्र लिखकर मांग किया है कि हॉकरों को उजाड़ने से पहले उनके पुनर्वास की व्यवस्था की जाए। " --- यह कहते हुए मंडल दा कुछ झेंप से गए। कारण कि वो वाम मोर्चा सरकार के गंभीर आलोचक और तृणमूल कांग्रेस के प्रबल समर्थक रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस की हार से बेचारे काफी मर्माहत भी हैं।
" अच्छा लगा यह जानकर, मंडल दा कि अभी बंगाल में न केवल लाल झंडा का अस्तित्व बचा हुआ है बल्कि वह गरीब - गुरबों की लड़ाई भी लड़ रहा है। खैर, यह बताइए कि हमारी जुझारू नेत्री ममता दी क्या कर रही हैं ? "
मनुआ का सवाल मंडल दा के सीने में तीर की तरह चुभा। उसने उनकी दुखती रग पर उंगली रख दी थी। उन्होंने भारी मन से जवाब दिया -- " तुम तो जानते हो कि सभी लोग उगते सूरज को ही प्रणाम करते हैं। ममता दी के साथ रहकर जिन्होंने सत्ता की मलाई खाई थी, आज वे.......! अभी तो वह बेचारी अपनी पार्टी बचाने में लगी है। "
मनुआ के मन में आया कि कह दे कि जब सत्ता में थी तो शेरनी थी और उसके जाते ही बेचारी हो गई ! लेकिन, उसने मंडल दा को और दुखी करना उचित नहीं समझा। सो, बात बदलते हुए पूछा -- " खैर, छोड़िए इन बातों को, दादा ! घर - परिवार का समाचार बताइये। वे लोग तो सुरक्षित हैं न ? "
" कोई क्या सुरक्षित रहेगा, मनुआ ! नफरती गैंग ने वह काम शुरू कर दिया है, जिसकी हमने कल्पना तक नहीं की थी। जो कुछ उत्तर प्रदेश में होता था, वही बंगाल में शुरू हो गया है। "
" मतलब...? मैं समझा नहीँ दादा ! "
" वही बजरंगियों का उत्पात...! एक दिन कुछ नौजवान लड़के मेरे पड़ोसी के घर में घुस गये । पूछने पर उन्होंने खुद को सनातनी बताया। आंगन में स्थित तुलसी - चौरा को लेकर घर के मालिक को डांटते हुए कहा कि इसकी पुताई - सफाई में कमी है, जल नहीं डाला जाता है, इस पर ध्यान दो। फिर उन्होंने पूछा कि ठाकुर - घर किधर है। जब उन्हें ठाकुर - घर दिखलाया गया तो भड़क गए। कहने लगे कि इस तरह फीका - फीका, उजड़ा हुआ ठाकुर - घर नहीं चलेगा, समझे। तनिक रंगाई - पुताई करो.... फूल - माला से सजाओ। हम इस तरह सनातन धर्म का अपमान नहीं होने देंगे.... इस तरह धमकी देते हुए चले गए। "
" यह तो किसी के व्यक्तिगत जीवन में सीधे - सीधे हस्तक्षेप है, दादा ! हम तो सोचते थे कि उनका टारगेट केवल मुसलमान होते हैं,........। "
" अरे, वे तो हैं ही, देखा नहीं बकरीद के समय इन्होंने कुर्बानी को लेकर क्या तांडव मचाया, बोला कि हम गौ माता की कुर्बानी नहीं होने देंगे। लेकिन, इस बार उनका दांव उलटा पड़ गया । "
" हाँ, सुना है कि मुसलमान भाइयों ने ख़ुद ही घोषणा कर दी कि इस साल हम बकरे के सिवा और किसी की कुर्बानी नहीं देंगे। "
" हाँ, लेकिन मसला इतना आसान भी नहीं था। क्योंकि बंगाल के गाँवों में हिन्दू किसान इसी समय के लिए गाय खरीद कर रखते और पालते हैं कि कुर्बानी के समय अच्छे दाम पर बेचेंगे। पर, अब तो खरीददार ने ही खरीदने से मना कर दिया। उनकी लाखों रुपए की पूंजी फंसती नजर आई। चारो तरफ हाय - तौबा मच गया तो सरकार ने एक युक्ति निकाली कि 14 बरस से अधिक उम्र की गायों की कुर्बानी दी जा सकती है...। "
" ये भी गजब लोग हैं, दादा ! मानो, 14 वर्ष के बाद गौ माता माता नहीं रह जातीं...! " -- मनुआ ने हंसते हुए कहा।
" अब क्या बोलें , मनुआ ! अभी तो इनकी सरकार बनी ही है, आगे और देखो क्या क्या होता है! " , मंडल दा के चेहरे पर घोर परेशानी के भाव दिख रहे थे। मनुआ को किसी शायर का एक शेर याद आ गया। उसने मुस्कुराते हुए कहा --
"इब्तिदा-ए-इश्क़ है रोता है क्या
आगे-आगे देखिए होता है क्या "
" अच्छा, मनुआ ! आता हूँ.... आज ड्यूटी भी ज्वाइन करना है। " --- कहते हुए मंडल दा चले गए।
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