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** पहली समुद्री यात्रा

                           ** पहली समुद्री यात्रा **
सुनकर माँ रोने लगी थी। उसके लिए तथा हमारे गाँव के अन्य सभी लोगों के लिए अंदमान - निकोबार द्वीप समूह का सिर्फ एक ही अर्थ था -- कालापानी। बात 1974 की जनवरी की है। देश को आजाद हुए महज दो - ढाई दशक ही हुए थे और कालापानी अभी तक लोगों के जेहन में घर किए बैठा था। हलांकि, आजादी के बाद केंद्र शासित प्रदेश के रूप में वह भारत का अभिन्न हिस्सा बन चुका था , जिसकी  राजधानी पोर्टब्लेयर है । घर के काम से मां को जब भी फुर्सत मिलती, वह उदास नजरों से मुझे निहारने लगती। एक तरफ उसे इस बात की खुशी थी कि मेरी नौकरी घर की माली हालत बदल देगी तो दूसरी ओर यह चिंता भी  कि इतनी कम उम्र में अनजाने परदेश में मैं कैसे जाऊंगा और रहूँगा! तब मेरी उम्र सिर्फ 18 वर्ष थी ।
                       ट्रेनिंग के बाद मिली एक महीने की छुट्टी समाप्त होने को थी और मैं इस बात से अनजान था कि पोर्टब्लेयर जाना कैसे है, कि वहाँ जाने में कितने दिन लगते हैं। जेनफॉर्म और वारंट लेते समय आई एन एस वालसुरा ( जामनगर) में जब मैंने आर पी ओ से इस संबंध में पूछा था तो उन्होंने कहा था कि तुम्हें छुट्टी के बाद कोलकाता स्थित आई एन एस हुगली ( वर्तमान में आई एन एस नेताजी सुभाष) , नेवल बेस में रिपोर्ट करना है, वहाँ से पोर्टब्लेयर भेजने की जिम्मेदारी उनकी है। मेरी प्रथम पोस्टिंग आई एन एस जरावा, पोर्टब्लेयर के ट्रांसमीटिंग स्टेशन में हुई थी। लगभग 72 ट्रेनिज ( सेलर्स) के बीच सिर्फ मेरी पोस्टिंग अंदमान निकोबार आइलैंड्स की राजधानी पोर्टब्लेयर हुई थी। बाकी सबकी पोस्टिंग मेनलैंड के ही किसी शिप या बेस में हुई थी।
अपने सभी सगे - संबंधियों और यार - दोस्तों से मिलते हुए कैसे एक महीना बीत गया, कुछ पता ही नहीं चला।
             रवानगी से दो दिन पहले से ही मां मेरे लिए रास्ते का कलेवा तथा दीर्घ काल तक सुरक्षित रहने वाले पकवान, ठेकुआ, नमकीन आदि बनाने में व्यस्त थी। काम करते हुए जब तब उसकी आखें डबडबा जातीं तो वह चुपके से आंचल के छोर से अपनी आँखों को पोंछ लेती। परिवार से फिर लंबे समय तक दूर रहना होगा, सोचकर मैं भी रह रहकर भावुक हो जा रहा था। पता नहीं, फिर कितने महीने बाद वापस आऊंगा !
                            बिदाई का क्षण बड़ा ही कष्टकर होता है। माँ सुबह से ही रोए जा रही थी। बाबूजी उसे समझाने में लगे हुए थे। कभी - कभी झिड़क भी दे रहे थे -- " ई रोना - धोना छोड़ो.... बेटा की सलामती की दुआ करो... अरे! जब उसने फौज की नौकरी चुन ही ली है तो सरकार जहाँ भेजे जाना ही पड़ेगा.... आखिर वहाँ भी तो किसी माँ का बेटा ही जाता है न  ! "
मैं चुपचाप अपने सामान समेटने और रखने में लगा था। बीच - बीच में माँ को ढाढ़स भी बंधा रहा था। अंत में, माँ - बाबूजी का चरण स्पर्श कर मैं घर से रवाना हुआ। माँ की सिसकियां दूर तक मेरा पीछा करती रहीं। गाँव से बाहर निकलने के बाद मैंने जब पीछे मुड़कर देखा तो मेरे धैर्य का बांध भी टूट गया। मेरी आंखें भी बरसने लगीं। धीरे - धीरे भारी कदमों से मैं आगे बढ़ता गया और मेरा गाँव पीछे छूटता गया। गाँव के सीवान पर पहुंचकर मैंने एक बार फिर गाँव की ओर देखा और अपने आंसुओं को पोंछ लिया।
                         गाँव से बस स्टैंड की दूरी लगभग डेढ़ - दो  किलोमीटर थी और गाँव का सड़क से न जुड़े होने के कारण उसे पैदल ही तय करना पड़ता था । मैने अपने सारे सामान कीट बैग एवं एक सूटकेस में भर लिये थे। कीट बैग में फौजी वर्दियां और बूट आदि थे तथा सूटकेस, जिसमें खाने की वस्तुएँ और सिविल कपड़े थे। इतना भारी सामान मैं कैसे लेकर जाऊंगा, सोचकर बाबूजी ने एक मजदूर से बस स्टैंड तक सारा सामान भिजवा दिया था।
बस स्टैंड पहुंचने के बाद आगे की यात्रा को लेकर मुझे चिंता होने लगी। जहानाबाद तक का सफर बस से और वहाँ से पटना तक ट्रेन से ।
           तब गया - पटना रेल खंड पर वाष्प इंजन वाली गाड़ियां ही चलती थीं। पी - जी लाईन की गाड़ियों में सफर करने में एक अलग ही तजुर्बा प्राप्त होता था। गाड़ी निर्धारित स्टेशनों पर तो रुकती ही थी, बीच में भी कहीं - कहीं वैक्यूम करके लोग अपने गाँव के पास उतर जाया करते थे।  इस तरह कभी - कभी जहानाबाद से पटना का सफर एक घंटे की बजाय तीन - चार घंटे में तय होता था। खैर, उस दिन गाड़ी अपने नियत समय से मात्र एक घंटे देरी से पटना पहुच गई थी।
                     पटना से जिस ट्रेन से ( शायद पंजाब मेल था) मुझे हावड़ा तक सफर करना था , वह रात्रि में थी। ट्रेन में रिजर्वेशन न होने के कारण मैं फौजियों के लिए आरक्षित डिब्बे में  अपने सामान के साथ चढ़ गया। दरअसल गाँव से पटना आकर बर्थ रिजर्व कराना उतना आसान भी नहीं था और उन दिनों आज की तरह ऑनलाईन रिजर्वेशन की सुविधा नहीं थी। डिब्बे में कोई खास भीड़ नहीं थी और चूंकि सभी फौजी ही थे, इसलिए मुझे बैठने की जगह मिल गई। हावड़ा की यह मेरी दूसरी यात्रा थी। पहली बार दानापुर से रिक्रूट होकर बेसिक ट्रेनिंग के लिए भाया हावड़ा ही हम कोचीन गए थे।
                                पिछली यात्रा के दौरान हावड़ा पुल को , जिसकी फोटो कभी हम किताबों में देखा करते थे, करीब से देखने का मौका मिला था । तब दो स्तंभों पर खड़े इस पुल को देखकर रोमांचित हुए बिना नहीं रह सका था । इंजीनियरिंग वर्क्स का अद्भुत नमूना है हावड़ा ब्रिज  ! इस बार मुझे उस अद्भुत पुल से होकर गुजरना था । गाड़ी से उतरकर मैंने कुली की मदद ली और स्टेशन से बाहर निकला। बाहर गजब की भीड़ थी। भागम - भाग मचा हुआ था। हर आदमी जैसे जल्दी में था। कोई बस की ओर भाग रहा था तो कोई ट्राम की ओर। सड़क के बीचोबीच लोहे की पटरियों पर धीरे - धीरे चलते ट्राम को मैं कौतुक से देख रहा था। किसी बड़े शहर में आने का मेरा यह पहला अवसर था। मैंने सोचा कि शायद इतने सामान के साथ इन बसों या ट्राम में सफर करने की इजाजत न होगी । साथ ही, मैं इस बात से भी अनजान था कि अपने गंतव्य तक जाने के लिए कितने नंबर की बस या ट्राम की सवारी करनी होगी। मुझे टैक्सी लेना ज्यादा उचित लगा। तभी मेरी नजर हाथ से खींचकर चलने वाले रिक्शे पर पड़ी। ऐसा रिक्शा मैंने पहले कहीं नहीं देखा था। बड़े - बड़े लकड़ी के बने पहियों वाला रिक्शा मेरे लिए किसी अजूबा से कम न था, जिसे खींचते हुए आदमी लगभग दौड़ रहा था । मैंने उसी की सवारी करने का मन बनाया और एक रिक्शेवाले को आवाज दी। वह मेरे पास आकर पूछा -- " कहाँ जाना है  ? "
" फोर्ट विलियम से आगे हेस्टिंग्स क्षेत्र में नेवल बेस, आईएनएस हुगली  । "
अब याद नहीं आ रहा है कि उसने कितना किराया मांगा था। पर, वह शायद मेरे मन मुताबिक ही था। मेरी स्वीकृति मिलते ही
उसने सामान उठाकर रिक्शे पर डाल दिया और मुझे बैठने का इशारा किया। जब मैं रिक्शे पर बैठ गया तो उसने आगे से रिक्शे को उठाकर उसके दोनों हत्थों को अपने कांख के नीचे दबाकर चलना शुरू किया। कुछ देर बाद उसने दौड़ना शुरू कर दिया। मैं सड़क से लगभग चार - साढ़े चार फीट ऊपर स्थित रिक्शे की गद्दी पर बैठा था। जब रिक्शा हावड़ा पुल से गुजर रहा था, मैं अपने दोनों ओर हुगली नदी में चलती नावों तथा स्टीमर्स को बड़े ही कौतुहल से देख रहा था। पुल की ऊँचाई इतनी थी कि उसके नीचे से बड़े - बड़े नाव और स्टीमर्स आ जा रहे थे। कुछ ही देर में हम कोलकाता के भीड़ - भाड़ वाले इलाके से गुजर रहे थे। तब मैं उन इलाकों के या सड़कों के नाम से अपरिचित था। प्रत्येक सड़क के बीच में ट्राम को चलने के लिए ट्रैक बने हुए थे। ट्राम का परिचालन ही शायद यातायात में रुकावट का कारण था। शीघ्र ही हम उस भीड़ से बाहर निकले और अब ईडेन गार्डेन क्रिकेट स्टेडियम के बगल से गुजर रहे थे। वह पूरा इलाका खुला - खुला था। चारो ओर खेल के मैदान थे। उसी जगह हॉर्स रेसकोर्स भी था। तकरीबन एक - डेढ़ घंटे बाद हमारा रिक्शा फोर्ट विलियम से आगे हेस्टिंग्स , अब न जाने उस क्षेत्र का क्या नाम है, स्थित आईएनएस हुगली के गेट के सामने था ।
                                    रिक्शा से उतरकर मैंने किट बैग को कंधे पर रखा और हाथ में सूटकेस लिये गेट में दाखिल हुआ। क्वार्टर मास्टर के कमरे के बाहर बरामदे में मैंने सामान रखा और अपने जेनफॉर्म के साथ उनके कमरे में प्रवेश किया। मैंने अदब से क्वार्टर मास्टर को नमस्कार किया। उसने मेरे हाथ से जेनफॉर्म लेते हुए पूछा -- " कहाँ से आ रहे हो  ? "
" छुट्टी से.... " , मैंने जवाब दिया।
उसने रजिस्टर में मेरा नाम, रैंक,नंबर, रिपोर्टिंग की तिथि - समय आदि नोट करते हुए कहा -- " अच्छा, तो तुम्हें भी पोर्टब्लेयर जाना है। जाओ, उस बिल्डिंग की दूसरी मंजिल पर वेटिंग शिप डोमैट्री है, वहीं चले जाओ। वहाँ और भी वेटिंग शिप सेलर्स रह रहे हैं। "
मैंने अपना सामान उठाया और उस इमारत की ओर चल पड़ा। कंधे पर किट्स बैग और हाथ में सूटकेस लिए मैं सीढ़ियां चढ़कर दूसरी मंजिल पर पहुँचा और बाईं ओर स्थित " वेटिंग शिप " डोमैट्री के दरवाजे से अंदर दाखिल हुआ। डोमैट्री के दूसरे छोर पर कुछ लोग बैठे ताश खेल रहे थे।
उनमें से किसी ने कहा कि लो भाई , एक और मुर्गा आ गया। उसकी बात पर सभी ठठाकर हंसने लगे।
मैंने सूटकेस रखा और कंधे से किट बैग उतार कर नीचे रखते हुए उनकी ओर देखा। तभी उनमें से एक ने मुझे पास बुलाया और पूछा -- " कहाँ से आ रहे हो  ? "
" छुट्टी से....सर! "
" अच्छा.... बेसिक ट्रेनिंग के बाद छुट्टी गए थे। कहाँ के रहने वाले हो  ? "
" बिहार के....। "
किसी ने हंसते हुए उस व्यक्ति से कहा -- " लो भाई मिश्रा जी! तेरा ही गराईं है। "
तब मैं इस शब्द " गराईं  " का मतलब नहीं जानता था। बाद में जाना कि एक  राज्य के लोग एक दूसरे को गराईं यानी गाँव वाले कहते हैं।
पहले ने अगला सवाल किया -- " क्या नाम है  ? "
" सत्येन्द्र कुमार.... "
" रिपोर्ट कर दिया  ? "
" यस सर  !
तभी किसी ने कहा कि चलो भाई लंच का टाईम हो गया। मिश्रा जी ने सबसे मेरा परिचय कराया, उनके रैंक और विभाग के साथ  । उनमें थे -- एलपीएम राजेश्वर सिंह, मेडिकल असिस्टेंट आर के शर्मा , सी वन आर मेहता, लीडिंग सी मैन बी एस अपरिचित, सिग्नल मैन सिन्हा आदि। परिचय के पश्चात् हम सब लंच के लिए नीचे उतर गए। गैली और डाइनिंग हॉल नीचले फ्लोर पर था।
                                                               क्रमशः....
( अगले किश्त में दो हफ्ते का कोलकाता प्रवास और तीन दिनों की समुद्री यात्रा के बारे में)

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