** मेरी पहली समुद्री यात्रा -- 2
( कोलकाता में प्रथम संक्षिप्त प्रवास )
जिस महानगर को आज हम कोलकाता कहते हैं, तब उसका नाम कलकत्ता था। अंग्रेजी में Calcutta. । नेवी के मेरे कुछ अंग्रेजीदां मित्र उसे सिर्फ Cal . कहकर भी संबोधित करते थे। खैर, मैं उस शहर में पहली बार आया था और उसके इतिहास - भूगोल से बिलकुल ही अनजान था। इसलिए कहीं भी घूमने जाने के लिए अपने सिनियर्स पर पूरी तरह निर्भर था।
आज का पता नहीं, पर उन दिनों बेस या शिप से सेलर्स के लिए " शॉर्ट लिव " , जिसे हम " लिबर्टी " कहते थे, शाम 4 बजे से रात्रि 12 बजे तक होती थी। उससे पहले हमें अपने बेस या शिप में आ जाना होता था। यह " लिबर्टी " शब्द शायद ब्रिटिश सरकार सेलर्स के " शॉर्ट लिव " के लिए प्रयोग करती थी। 1947 से पहले जहाजों के अफसरान ज्यादातर गोरे होते थे और सेलर्स ( नाविक) भारतीय। इसलिए उन्होंने कुछ ऐसे शब्द भारतीय सेलर्स के लिए बनाए थे जो हमें हमेशा यह एहसास कराये कि हम उनके गुलाम हैं। वे हमें मनुष्य की बजाय " हैंड्स " मानते थे। एक सेलर यानी वन " हैंड " , दो सेलर्स यानी टू हैंड्स और आगे की भी गिनती इसी तरह। इसीलिए सुबह जगाने का आदेश होता था -- " हैंड्स कॉल " , चाय के लिए " हैंड्स टू टी ", नाश्ता के लिए " हैंड्स टू ब्रेकफास्ट ", लंच के लिए " हैंड्स टू लंच " रात का खाना के लिए " हैंड्स टू डिनर " और लाइट ऑफ कर बेड पर जाने के लिए " पाईप डाऊन, गुड नाईट " । ये सारे आदेश पब्लिक ब्रोडकास्ट सिस्टम से दिये जाते थे। बेसिक ट्रेनिंग के दौरान ही इन शब्दों से साबका पड़ चुका था। थोड़ी बहुत अंग्रेजी जानने के कारण और सभी आदेशों का अर्थ तो मैं समझ गया था, किन्तु सोने को " पाईप डाऊन " क्यों कहते हैं, समझ नहीं पाया था। तब एक दिन एक सिनियर सेलर से पूछा था। उन्होंने बताया कि अंग्रेजी शासन के दौरान अंग्रेज ही नहीं कुछ भारतीय सेलर्स भी पाईप, सिगार या सिगरेट्स पीते थे। रात्रि 10 बजे के बाद इनके सेवन पर रोक होती थी। इसीलिए उक्त आदेश को " पाईप डाऊन " कहते थे। लेकिन आजादी के दो - ढाई दशक बाद तक ये आदेश उसी रूप में क्यों बने रहे, मालूम नहीं। और, अब क्या परिवर्तन हुए हैं, यह भी नहीं मालूम।
हाँ, तो मैं अभी उस कलकत्ता (बंगाल) में था, जिस के बारे में कुछ गलत धारणाएँ हमारे गाँव के लोगों के जेहन में घर किये बैठी थीं । कलकत्ता या बंगाल में रोजगार या व्यापार के लिए जानेवाले कई लोगों के नहीं लौटने और उधर ही शादी - व्याह कर बस जाने के सच्चे - झूठे किस्से गाँव की हवाओं में तैरते रहते थे, जिन्हें मैं बचपन से सुनते आया था। भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जानेवाले रंगकर्मी भिखारी ठाकुर अपने विदेशिया नाटक में कई तरह के विरह गीत प्रस्तुत किया करते थे। पति कमाने के लिए परदेश जाता है और बरसों वापस नहीं आता है। एक गीत तो बिहार के गावों में आज भी बहुत प्रचलित है --- " छव रे महीना कहके.....गइले परदेशवा, से बीति गेलई बारह बरीस रे बटोहिया .... से बीति गेलई बारह बरीस रे बटोहिया .....! "
आज से पचास साल पहले इस गीत का क्या असर रहा होगा, जरा कल्पना कीजिये! मेरे अपरिपक्व दिमाग के कोमल तंत्रिकाओं पर इन सच्ची - झूठी बातों का इतना असर था कि प्रारंभ में दो - चार दिनों तक मैं कोलकाता में कहीं भी अकेले आने - जाने में झिझक रहा था। बेस के कैंपस में ही फुटबॉल ग्राउंड था , जिसमें प्रतिदिन शाम को फुटबॉल खेला जाता था। चूंकि फुटबॉल मेरा प्रिय गेम था, रोज शाम को मैं ग्राउंड में पहुँच जाता और फुटबॉल खेलता।
फिर एक शाम जब वेटिंग शिप के हमारे सिनियर्स " लिबर्टी " जाने के लिए तैयार हो रहे थे , मैंने मिश्रा जी से, जो तबतक मेरे स्वघोषित लोकल गार्जियन बन चुके थे, साथ चलने की इच्छा जाहिर की। स्वीकृति मिली और मैं फटाफट तैयार। " लिबर्टी " के लिए पाईप बजी और हम क्वार्टर मास्टर के कार्यालय के सामने पंक्तिबद्ध होकर खड़े हो गए। ऑफिसर ऑफ दी डे ( OOD) द्वारा मुआयना के बाद हमलोगों ने " लिबर्टी बुक " में नाम दर्ज कराया और गेट से बाहर चौड़ी सड़क, शायद उसका नाम " स्ट्रैंड रोड " था, पर निकल पड़े।
यह वही स्ट्रैंड रोड था, जिसके बारे में कहा जाता है कि हुगली नदी के किनारे ब्रिटिश सरकार ने ब्रिटेन से मिट्टी लाकर इसे बनाया था। हुगली नदी के किनारे बने इस रोड पर एक तरफ बड़े - बड़े वेयर हाउस बने हुए थे, जहाँ जहाज द्वारा लाया गया सामान स्टोर किया जाता था । हेस्टिंग्स का पूरा इलाका आर्मी और नेभी के ऑफिस तथा अफसरों के आवास से भरा हुआ था। शायद अब भी वैसा ही है !
वह पहला दिन था जब मैं कलकत्ता में घुमने निकला था। हमारे सभी सिनियर्स आगे - आगे चल रहे थे और मैं तथा सिन्हा, दोनों जूनियर्स, पीछे - पीछे। हम दोनों को यह भी नहीं पता था कि हमसब जा कहाँ रह हैं । मैं तो बस तफरीह के लिए साथ हो लिया था। कुछ दूर चलने के बाद हम एक ऐसी पतली सड़क से गुजर रहे थे, जिसके दोनों तरफ के दृश्य देखकर मेरा मन घबराने लगा था। डर के मारे पूरा बदन कांपने लगा था। सिन्हा का भी वही हाल था। हम दोनों ने एक दूसरे का हाथ कसकर पकड़ लिया। हमारे सिनियर्स उस बाजार में यूंही मोल - भाव करते, हंसी - मजाक करते और बेवजह हंसते - खिलखिलाते चल रहे थे। हम दोनों इतना घबराए हुए थे कि वहाँ से भाग जाना चाहते थे। अत: हमने अपनी चाल थोड़ी तेज कर दी और अपने सिनियर्स को पीछे छोड़ते हुए आगे निकल गए। सड़क के आखिरी छोर पर स्थित खिदिरपुर पुल के नीचे जाकर ही हमने दम लिया। बाद में मालूम हुआ कि वह खिदिरपुर का " रेड लाइट ऐरिया " था -- मुंशी गली। वापसी के बाद मिश्रा जी ने बताया कि वे जानबूझकर मुझे उस इलाके में ले गए थे ताकि फिर कभी गलती से भी उस सड़क की ओर न जाऊँ।
अगला दिन शनिवार था। मिश्रा जी ने सबके साथ मिलकर फिल्म देखने की योजना बनाई। चूंकि पढ़ाई के दौरान पटना में फिल्म देखने का चस्का मुझे लग चुका था , मैने भी चलने की पेशकश की। मिश्रा जी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया -- " हाँ - हाँ, जरूर चलो। ... सच पूछो तो तुम्हारे लिए ही मैंने इस फिल्म को देखने की योजना बनाई है । "
हम सभी पैदल चलकर फोर्ट विलियम तक आये, जहाँ से बसें गुजरती थीं। बस में सवार होकर हम एसप्लेनेड ( धर्मतला) पहुंचे। धर्मतला की विशालता और रौनक देखकर मैं विस्मित था। चारो ओर बड़ी - बड़ी इमारतें, मजबूत स्तंभों पर टिकी फुटपाथ की छत और फुटपाथ पर रंग - बिरंगी वस्तुओं से सजी हुईं छोटी - छोटी दूकानें। सामने ग्रांड होटल का भव्य भवन। पास में ही कलकत्ता का मशहूर सिनेमा हॉल " मेट्रो " ।
पर , हम जिस सिनेमा हॉल में गए थे, वह मुख्य सड़क से थोड़ा हटकर पीछे की ओर था। अब उस सिनेमा हॉल का नाम तो मुझे याद नहीं है, पर उस फिल्म का नाम अवश्य याद है और शायद उसे मैं कभी भूल भी नहीं सकता । फिल्म का नाम था -- " गुप्त ज्ञान " । बताने की जरूरत नहीं कि वह फिल्म काफी शिक्षाप्रद थी। किशोर वय में देखी गई उस फिल्म ने मेरे मन - मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डाला था।
अपने उस चंद दिनों के प्रवास के दौरान मैं सिन्हा के साथ एक या दो दिन और धर्मतला तथा चौरंगी की ओर घुमने गया था । उस दौरान विक्टोरिया मेमोरियल को छोड़कर और कोई दूसरा ऐतिहासिक स्थल देखा था, ऐसा याद नहीं।
डेढ़ या दो सप्ताह ही बीते होंगे कि हमारी प्रतीक्षा की घड़ी खत्म हो गई। पैसेंजर शिप " एम वी अंदमान " पोर्टब्लेयर से आ चुकी थी और उससे जाने के लिए हमारा " बंक " आरक्षित हो चुका था। उन दिनों सप्ताह में एक दिन सोमवार को हवाई जहाज कलकत्ता से पोर्टब्लेयर जाती थी, जिसमें सिविल या फौज के अफसर आते - जाते थे। और, प्रत्येक शुक्रवार को एयरफोर्स की मालवाहक हवाई जहाज, " डकोटा ", पोर्टब्लेयर, कार निकोबार या कमोर्टा द्वीप सहित सभी फौजी ठिकानों के लिए रसद ( चावल, दाल, सब्जियां, अंडे, मीट आदि) लेकर जाती थी। हाँ, हमारी चिट्ठियां, हफ्ते भर के हिंदी - अंग्रेजी के अखबार और कुछ मासिक पत्रिकाएं भी। " एम वी अंदमान " और " एम वी स्टेट ऑफ हरियाणा " , दोनों ही जहाजें अंदमान - निकोबार द्वीप समूह की जीवन रेखा थीं। कोलकाता और चेन्नई दोनों बंदरगाहों से पोर्टब्लेयर तक इनका आना जाना होता था। फौजियों, पुलिस वालों, सरकारी, अर्द्ध सरकारी मुलाजिमों तथा अप्रवासी मजदूरों के लिए ये ही दो जहाजें आवागमन के एकमात्र साधन थीं।
क्रमशः...
( अंतिम किश्त -- कलकत्ता से पोर्टब्लेयर भाया पानी जहाज )
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